कुंडलिया. . . .
कुंडलिया. . . .
निपट अनाड़ी बालमा, समझ न पाया बात ।
खामोशी में कट गई, अभिसारों की रात ।।
अभिसारों की रात , लाज से बीती जाती ।
बालम बैठे दूर , तिमिर में बुझती बाती ।।
आए थोड़े पास , गाल पर चुभती दाड़ी ।
कहती मन की बात, लगे तू निपट अनाड़ी ।।
सुशील सरना/27-11-25