मैं पुस्तक हूँ
मैं पुस्तक हूँ। शब्दों से भरे कागज का पुलिन्दा नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रकाश हूँ। मेरी अपनी साख है, ऊष्मा है, विशिष्टता है। अतिरंजित वर्णन से घबराती हूँ। सत्य, विज्ञान और तर्क सम्मत लेखनी से प्रदीप्त होती हूँ। समानता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व, कल्याण और न्याय को स्थापित करने में मुझे बहुत आनन्द आता है। असत्य, अधर्म और अन्याय के शब्दों से मेरी रूहें दुखती हैं।
सृष्टि के आरम्भ से ही मुझे किसी न किसी रूप में मनुष्यों ने ही लिखा। मैं किसी देव या दानवों द्वारा नहीं लिखी गई। मैं विशुद्ध रूप से मानवीकृत हूँ। बाल कहानियों और कविताओं के रूप में बच्चों द्वारा पसन्द की जाती हूँ। स्कूलों में विद्यार्थियों के हाथों में रहकर मुस्काती हूँ। कभी संविधान बनकर देश चलाती हूँ। कभी ज्ञान के रूप में जग रौशन कर जाती हूँ। कभी भूख के संग मिलकर क्रान्तियाँ लाती हूँ। आध्यात्मिक रूप में निर्वाण की ओर ले जाती हूँ।
ऐ मेरे बच्चों, ऐ शुद्ध-बुद्ध आत्मन, मुझे कभी गलत रूप में मत लिखना, वरना मेरी आत्मा दुखेगी और मेरी इस पीड़ा को सारी दुनिया भुगतेगी। तुम मुझे उस रूप में लिखना कि समाज की बुनियाद और जनकल्याण की औषधि बन सकूँ। किसी अन्धविश्वास और भूल-भुलैया का महिमा-मण्डन करने की बजाय ऐसे लिखना कि पाठकों के दिल-दिमाग को झकझोर कर उन्हें सत्यपथ पर अग्रसर कर सकूँ। ऐसे लिखना कि मैं वो कुल्हाड़ी बन सकूँ, जिसमें सदियों से उगे झाड़-झंखाड़ को साफ कर एक नई राह निर्मित कर सकूँ। सते हितम् । सत्य में कल्याण, सबका कल्याण।
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
साहित्य वाचस्पति
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शामिल रहे एक साधारण व्यक्ति
हरफनमौला साहित्य लेखक