ग़ज़ल
शर्वरी पर रहा चाँदनी का असर,
दूधिया दूधिया हो गया है नगर
प्यार से बैठते थे घनी छाँव में
याद आता रहा गुलमुहर का शज़र
ख़ूब लम्हे चुराए, जमाने से जो
हमने लूटे मज़े ख़ूब शाम-ओ – सहर
वो मुझे मिल गया मैं उसे मिल गई,
ज़िन्दगी प्यार में हो रही है बसर।
“रागिनी” ज़िन्दगी चार दिन की ही है
क्यों नहीं हम चुनें प्यार वाली डगर
डाक्टर रागिनी स्वर्णकार शर्मा,इंदौर