मैं दुश्मन ही सही, दुश्मनी निभाने के लिए आ,
मैं दुश्मन ही सही, दुश्मनी निभाने के लिए आ,
सूने से दिल-ए-ज़ार को, जलाने के लिए आ।
तन्हाइयाँ सुनेंगी, तेरी पायल की सदा को,
मेरे घर को, रोशन कर जाने के लिए आ।
कल रात भी, यादों ने बहुत शोर मचाया,
अब ख़्वाबों को, महकाने के लिए आ।
हम भी तेरी बाट में, यूँ ही मिट न जाएँ कहीं,
थोड़ा सा जहर खुद से, पिलाने के लिए आ।
जो बात तेरी आँखों में छुपी है, वो कह दे,
इस दिल की उलझनों को, सुलझाने के लिए आ।
मरहम न सही, चुभने ही दे कुछ तेरी बातें,
इस जिस्म में, आख़री नश्तर चुभाने के लिए आ।
@श्याम सांवरा…