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26 Nov 2025 · 1 min read

*मन के पंछी*

मन के पंछी
(अंगिका रचना)

चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो (तब पर भी) भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो ,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।
धुरदा-धुईयां धूप केय साथे,
गिट्टी से रिश्ता पैलहियों;
हवा मोड़ी केय दौरी घूपी केय,
छाया मेय भी हड्डी सुखैलिहों।
समय केरो चक्र ऐन्हो चल्लहों,
खुद के झोंकी देलहियों
प्लेटफार्म पर खड़े रही गेलहियों;
छुटी गैलहों सब गड़िया,
की पाय केय रहे, की पाय लेलहियों
सब ताकतेंह रही गेलहियों।
चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो (तब पर भी) भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो ,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।

✍️ – अंगरक्षक सूरज
26/10/2025

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