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26 Nov 2025 · 5 min read

अध्यात्म सिर्फ कर्मकांड नहीं है?

अध्यात्म कर्मकांड तक सीमित नहीं

अध्यात्म का प्रतिपादन सहज व सरल नहीं है। स्वयं को पूजा पाठ व कर्मकांड में संलग्न रखकर आध्यात्मिक उपलब्धि की आशा करना मन को बहलाना भर है। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि परमात्मा को खुश करने का तरीका चढ़ावें तक सीमित मान लिया गया।आजकल दस बीस मिनट के पूजा पाठ,देव दर्शन,जप, ध्यान स्त्रोत को पाप मुक्ति, आत्मिक प्रगति मान लिया गया। इतने मात्र से ईश्वर प्रसन्न हो जाएगा और अभीष्ट कामनाएं पूर्ण कर देगा। इसी धारणा पर दुर्भावग्रस्त एवं पापलिप्त होकर स्वयं को आध्यात्मिक मानने की भूल करते हैं।हर छोटा मोटा कर्मकांड समस्त पापों को नाश करने वाला प्रमाणपत्र मान लिया जाता है। परमात्मा को बहला फुसलाकर सद्गति का प्रयोजन कैसे पूर्ण होता होगा, भगवान को नादान मानना आत्महीनता का ही परिचय देना है। कर्मकांड साधन तो हो सकता है लेकिन साध्य नहीं है। कर्मकांड को भी नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इसमें मूल रूप से प्रार्थना ही समाहित है, प्रार्थना करने से शरीर और मन में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं,शरीर स्वस्थ होता है एवं मन विकारों से मुक्त होकर सकारात्मक चिंतन करने लगता है। प्रार्थना से आध्यात्मिक प्रगति भी होती है। आत्मविद्या की उत्कृष्टता का नाम आध्यात्म है। आध्यात्मिक जीवन कमजोर, डरपोक,कायर, आलसी नहीं बनाता वरन् विश्वामित्र, अगस्त्य, श्रृंगी, परशुराम, वसिष्ठ, द्रोणाचार्य, भीष्म, दधीचि आदि के कठोर कृर्तृत्वों की तरह अधिक भारी कार्य कर सकने की क्षमता प्रदान करता है। प्रचलित सामाजिक मान्यता रही है कि अध्यात्म मानसिक दृष्टि से व्यक्ति को दीन दुर्बल, कायर, समझौतावादी एवं परावलंबी बनाता है,यति योद्धा नहीं हो सकता है। सही बात यह है कि सच्चा यति,आध्यात्मिक व्यक्ति संकल्पशक्ति का धनी,आत्मबल से भरा, साहसी , शोर्य पराक्रमी रहता है, ब्रह्मचारी नपुंसक जैसा दिखता भर है,पर उसका पौरुष कामुकों की अपेक्षा बढ़ा चढ़ा होता है। सांसारिक भौतिकवादी मनुष्य विषय परिस्थितियों में दुखी, व्याकुल होकर भाग्य व भगवान तक को भला बुरा कहने में नहीं चूकता है। आध्यात्मवादी ईश्वर की इच्छा से अपनी इच्छा मिलाकर, संसार को नाट्यशाला मानकर,अपना अभिनय उत्साह पूर्वक करते रहने में प्रसन्न रहता है।जिस मृत्यु का भय जनसाधारण को भयभीत करता है,उसी के लिए आज भी बहुत से साधु संत समाधी लेते देखे सुने जाते हैं। अध्यात्म के मार्ग पर बढ़ने के लिए षड विकारों (काम ,क्रोध,लोभ, मोह ,मद ,मत्सर )से मुक्त होकर अध्यात्म के मूल सिद्धांतो यथा
धृति: क्षमा दमोsस्तेयं शौचमन्द्रिय निग्रह:।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।
इन्हीं दस लक्षणों के आधार पर
स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन,सभ्य समाज, देवत्व की धारणा,आत्मवत् सर्वभूतेषु तथा स्वर्गानुभूति, वसुधैव कुटुंबकम् के सदचिंतन से सद्बुद्धि, सद्ज्ञान, सद्चरित्र के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके बिना मनुष्य मनुष्य नहीं,नर पशु ही है। रामचरित मानस में कहा गया है —
जिन्ह हरि भगति हृदयॅ नहिं आनी।जीवत सव समान तेइ प्रानी।।
जीव न खाली हाथ आता है न खाली हाथ जाता है, अपने साथ कर्मफल व संस्कारों को लेकर ही आवागमन करता रहता है।इस आवागमन से मुक्ति पाना ही अध्यात्म मार्ग है।
आध्यात्म उस शक्ति, वृत्ति, साधना का नाम है जिससे स्वयं को पहचाना जाता है,स्व अर्थात आत्मा की पहचान से परमात्मा की पहचान हो जाती है। जीव की कोई पृथक सत्ता नहीं है बल्कि परमात्मा का ही आभासी रूप है। आध्यात्म सम्रगता का स्वरूप है जिसमें भौतिकवाद की अपेक्षा नहीं है बल्कि भौतिकता का सही रूप में उपयोग है। भौतिकता का सिर्फ उपभोग करना,आलस,प्रमाद,अपव्यय, अहंकार, प्रदर्शन, फिजूलखर्ची, अशिष्ट असभ्य, स्वार्थ, बड़प्पन बढ़ाने में हो तो उसे अनगढ़ स्तर हीन कहा जाता है।आत्मिक प्रगति के लिए श्रमशीलता, शिष्टता, मितव्ययता, सुव्यवस्था, सहकारिता ये पांच अपनाना आवश्यक है।
शारीरिक और मानसिक पवित्रता के साथ ही आध्यात्मिक पवित्रता भी आवश्यक है क्योंकि इसके बिना मनुष्य जीवन के प्रधान लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। आध्यात्मिक पवित्रता से ही सच्चे प्रेम, भक्ति, दया, उदारता, परोपकार की भावना जागृत होती है और देवत्व का विकास होता है।
पवमान: पुनातु मा क्रत्वे दक्षाय जीवसे।अथो अरिष्टतातये।। अथर्ववेद

अर्थात हे परमात्मा, मेरे हृदय में भक्ति भाव और कर्यण्यता का विकास हो। मुझे आरोग्यमय जीवन प्राप्त हो। मुझे सभी ओर से पवित्र बनाइए।
पवित्रता एक आध्यात्मिक गुण है। आत्मा स्वभावत: पवित्र और सुन्दर है इसलिए आत्मपरायण व्यक्ति के विचार, व्यवहार तथा वस्तुएं सदा स्वच्छ और सुन्दर होते हैं। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पवित्रता से ही जीवनोद्देश्य की प्राप्ति संभव है।
भारत की आध्यात्मिक संस्कृति सुख से भी आगे संतोष और आनंद को महत्व देती है। सुख और संतोष में जमीन आसमान जैसा अंतर है। सुख भौतिक है तो संतोष आध्यात्मिक।सुख भोग परक है तो संतोष अनुभूति परक।
उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यम चृत।अवाधमानि जीवसे।। ऋग्वेद
अर्थात पुत्रैषणा,वइत्तऐषणआ तथा लोकेशणा की भावना से हम उन्मुक्त हो क्योंकि इनसे हमारी आत्मा पतित होकर दुख पाती है।
मनुष्य सदैव आत्म संतोष और आनंद की चाह रखता है। कभी कभी संतोष सुख प्राप्त से और कभी कभी सुख त्याग से मिलता है। मनुष्य जब अपने सुख की चिंता करता है,तब वह दूसरों की परवाह नहीं करता और स्वार्थी बन दूसरों को दुख पहुंचाने लगता है। ऐसा आचरण करने वाले अनैतिक, अवसरवादी, समाज के शोषक तथा स्वार्थी माने जाते हैं। पुत्रैषणा,वित्तैषणा और लोकेषणा की भावना से वह संसार में लूट खसोट तो खूब करते हैं पर सुख का आस्वादन नहीं कर पाते वल्कि पुत्र व परिवारी भी कुमार्गी होकर दुख व अपयश के साथ आध्यात्म से कोसों दूर हो जाते है।
वेद वाक्य है कि मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है।
स्वयं वार्जिस्तन्वं कल्पयस्व स्वयं यजस्व स्वयं जुषस्व। महिमा तेsन्येन न सन्नशए ।। यजुर्वेद
अर्थात दूसरों के आशीर्वाद या उपदेश से किसी की ध्येय सिद्धि कदापि नहीं हो सकती इसके लिए स्वयं अपने शरीर,मन और आत्मा से सत्कर्म तथा परोपकार के कार्य करने होंगे।
आशीर्वाद व उपदेश के पीछे सिर्फ एक ही आध्यात्मिक सोच होती है कि मनुष्य के मन में उत्साह व तेजस्विता की भावना जन्म लेती है। उसकी अन्त: चेतना इस विश्वास से भर उठती है कि आशीर्वाद और उपदेश की शक्ति उसके कार्यों में सफलता प्रदान करने में सहायक रहेगी,वह दोगुने उत्साह से कार्य करने में लग जाता है।
मनुष्य स्वभावत:‌न तो बुद्धिमान है और न मूर्ख,न भला है और न बुरा। वस्तुत: वह बहुत संवेदनशील प्राणी है। जैसा कुछ वातावरण मस्तिष्क के सामने छाया रहता है उसी ढांचे में ढलने लगता है।ईश्वर भक्ति, सत्संग और स्वाध्याय से ही उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है।
पावमानी: स्वस्त्ययनीस्ताभिर्गच्छति नान्दनम्। पुण्याॅश्च भक्षान्भक्षयत्यमृतत्वं च गच्छित।। सामवेद
अर्थात जिससे मनुष्य के विचार सत्कर्म की ओर प्रेरित होते हो, ऐसे साहित्य के स्वाध्याय से स्त्री पुरुषों को आनंद मिलता है।वे जीवन भर उत्तम पदार्थों का सेवन करते हुए अंत में मोक्ष प्राप्त करते हैं।
स्वाध्याय शब्द के दो अर्थ हैं,पहला वेद और वेद सम्मत सद्ग्रंथों का अध्ययन और दूसरा स्व अध्ययन अर्थात स्वयं का अपना अध्ययन,आत्म निरीक्षण। नित्य नियमित एक घंटा स्वाध्याय के लिए लगा सकें तो थोड़े ही समय में मनुष्य के विचारों की उत्कृष्टता प्रदर्शित होने लगती है। व्यक्ति आध्यात्म की ओर सहज ही बढ़ने लगता है।
जय सियाराम
राजेश कुमार कौरव सुमित्र
9993618491

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