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26 Nov 2025 · 30 min read

खंडकाव्य : "भीम-दीप"

खंडकाव्य : “भीम-दीप”

लेखक: सुनील बनारसी


प्रस्तावना

“भीम-दीप” एक खंडकाव्य मात्र नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक चेतना की आत्मकथा है। यह काव्य उस युग-पुरुष की वाणी बनता है जिसने तमस के गर्भ से जन्म लेकर समता और न्याय की लौ जलाई। यह काव्य डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन, संघर्ष, और बौद्धिक ज्योति की एक पदबद्ध यात्रा है — जिसमें नायक केवल इतिहास नहीं रचता, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को भी मार्गदर्शन देता है।

खंडों में बाँटे गए इस काव्य में प्रत्येक खंड 50 पदों से समृद्ध है, जो विषयगत गहराई, वैचारिक स्पष्टता और काव्यात्मकता के सुंदर समन्वय का उदाहरण हैं। भीम-दीप अंबेडकर को देवता नहीं, मनुष्य के रूप में युगद्रष्टा के रूप में चित्रित करता है — जो अपने समय की अन्यायपूर्ण व्यवस्था को कलम, ज्ञान और धम्म से चुनौती देता है।

यह काव्य केवल स्मरण नहीं — एक समवेत संकल्प है।
एक दीप — जो बुझने के लिए नहीं, युगों तक जलने के लिए है।

📚 खंड अनुक्रमणिका

खंड शीर्षक विषयवस्तु

1 शोषण की कोख से उत्पीड़न, जातिवाद और आत्मसम्मान का जन्म
2 ज्ञान की ज्वाला शिक्षा, स्वावलंबन और आत्मबोध
3 समानता का संग्राम आंदोलनों, लेखनी और संविधान तक संघर्ष
4 संविधान का संकल्प लोकतंत्र, न्याय, समानता की रचना
5 बुद्ध की शरण में धम्म दीक्षा, करुणा और आत्ममुक्ति की घोषणा
6 अमर विचारक मृत्यु के पार भी विचारों की यात्रा और प्रेरणा

खंडकाव्य : “भीम-दीप”
लेखक: सुनील बनारसी
पद 1-50

खंड 1: शोषण की कोख से
लेखक: सुनील बनारसी

पद 1
धरा धुली, पर रत्न विलक्षण,
जन्मा एक दीप, तमस में चंचल।
भीम नाम, पर नाम नहीं वह,
था युग-प्रश्न — करुणा का संबल॥

पद 2
कंधे झुके थे, बोझ नहीं था,
बस जाति-पंथ का ताप लिया।
पानी तक को वर्जित पाया,
मानव होते भी श्राप लिया॥

पद 3
गुरुकुल से भी बाहर ठुकराया,
“अस्पृश्य!” यह शापित वाक्य हुआ।
विद्या की वीणा मौन रही,
जब भीम का प्रश्न प्रताप हुआ॥

पद 4
माँ ने आँचल आँसू से धोया,
भात नहीं, पर स्नेह दिया।
स्निग्ध अंधेरा था चारों ओर,
पर भीम ने स्वाभिमान पिया॥

पद 5
जिसने शोषण को प्रश्न बनाया,
और पीर को स्वर देना सीखा।
जिसने लाठी नहीं उठाई,
बस ज्ञान से पत्थर चीखा॥

पद 6
ग्राम-कूप थे, जल न मिला,
मंदिर के द्वार न खोले।
लेकिन आत्मा की अग्नि ने,
नवसृजन के दीप भरे टोले॥

पद 7
छाया थी पर थाली रीती,
कंठ सूखा, मन अभिलाषी।
भीम न रोया, न चीखा कुछ,
बस बनता गया इतिहासी॥

पद 8
कागज की ना नाव मिली थी,
ना तो कोई मस्तक ताना।
हृदय लिए था एक अनजाना,
जिसमें जलता स्वाभिमाना॥

पद 9
सूखी रोटी, टूटे बर्तन,
माटी का घर, पर स्वप्न अमर।
नयन जले पर प्रश्न उठे थे,
क्यों जीवन इतना विषधर?

पद 10
भीड़ में वह एकाकी था,
छाया-सा चलता रहा मौन।
कोई कहे — “ये क्या जानेगा?”
पर वह बनता गया ‘प्रवाचक-गौन’॥

पद 11
धूप से बढ़कर आग मिली थी,
हर साँस में था श्राप समाया।
पर छाया बन चल पड़ा वो,
जिसने अंधकार से नाता तोड़ा।

पद 12
आहट तक थी वर्जित उसके,
पगचिह्नों पर ताना था।
जैसे छाया अपवित्र लगे,
उसका अस्तित्व निशाना था॥

पद 13
न खेल सका वह आँगन में,
न बैठा शाला की पंक्ति।
पढ़ना भी एक ‘अधिकार’ था,
जिस पर लिपटी थी भ्रांति॥

पद 14
“जाति” — न थी कोई भावना,
बल एक भयग्रस्त विधान।
जिसने मानव को बाँट दिया,
दिया करुणा को परित्यागान॥

पद 15
क्लेश-कलुष से जन्मा दीपक,
ना दीपक — वह ज्वाला था।
जन्मभूमि की धूल छानकर,
संवेदना का त्रिशाला था॥

पद 16
माँ ने कहा — “तू धैर्य धरो,
यह चट्टान नहीं चिरकाल।
ज्ञान बना जब लक्ष्य तुम्हारा,
तब बंधन होंगे कंगाल”॥

पद 17
कंठ में था असहाय मौन,
पर आँखों में गूढ़ जिज्ञासा।
वह प्रश्न पूछना सीख गया था,
जहाँ रुक जाती थी भाषा॥

पद 18
कथा नहीं थी भीम की पीड़ा,
वह युग का नव-प्रश्न बना।
जिसने उत्तर माँगा सबसे,
पर उत्तर में तर्क तना॥

पद 19
ग्राम्य-कूप से दूर रहा वह,
मंदिर-द्वार भी थे बंद।
पर आत्मा का सागर उसका,
था सर्वधर्मों से आनन्द॥

पद 20
धूलि भरे पग, विदीर्ण चरण,
पर नयनों में व्रत की आग।
भीम चल पड़ा एकाकी,
लेकर समता की मशाल-विराग॥

माटी से ही दीप निकला,
जिसे अंधकार ने सींचा।
भीतर जलती पीड़ा को,
भीम ने मौन नहीं, लेखा।

22.
गाँवों में जब नाम पुकारा,
हास्य बना हर बार वह।
“अछूत!” सुनते-सुनते भी,
जाग उठा आत्मस्वर वह।

23.
बाल सखा न कोई रहा,
बस पीठ पर ताने शब्द रहे।
पर होठों पर कोई शिकवा ना,
नेत्रों में केवल दृढ़ संकल्प रहे।

24.
बस्तियों से बाहर बैठे,
भोजन भी छाया से दूर।
कुशासन की कालिख को
भीम ने समझा सहज न क्रूर।

25.
जल पीना भी अपराध था,
छाया भी अभिशाप हुई।
पर इस पीड़ा की जड़ में,
ज्ञान की भूख फिर जाग गई।

26.
कांधे झुकते जाते थे पर,
मन का दीपक मंद न हुआ।
संवेदना की अग्निशाला में,
भीम सतत प्रचंड हुआ।

27.
माँ की गोद में चुपचाप,
बहता रहा एक युगदाह।
भात नहीं, पर आँचल में,
मिला उन्हें जीवन की चाह।

28.
भाषा बनी करुणा उनकी,
नयन बने इतिहास के पृष्ठ।
भीम ने अपनी चुप्पी से,
बना दिए गूंगे भी साक्ष्य दृष्ट।

29.
दूरी रही जल से, पर
अग्नि भीतर सुलगती रही।
भीम के हर आँसू में,
आग मनु की गलती रही।

30.
वेदों की छाया में रहकर,
जिन्हें अपमान मिला हर रोज़।
उनकी आँखों में भी गूंजे,
“मैं भी मनुष्य!” के घोष।

31.
छोटे हाथों में बड़े स्वप्न थे,
नंगे पाँवों में आग बसी।
तप नहीं कोई ऋषि जैसा,
पर उनके भीतर क्रांति हँसी।

32.
शब्दों के बिना भी बोले,
उनके मौन ने जग को पढ़ा।
हर उपेक्षा की गठरी को,
उन्होंने अपने कंधे चढ़ा।

33.
भिक्षा में पढ़ना भी सीखा,
पर भिक्षुक कभी बने नहीं।
ज्ञान के लिए झुके ज़रूर,
पर मान के लिए झुके नहीं।

34.
गुरु भी जब मुँह मोड़ गए,
भीम ने नयन का दीप जलाया।
अक्षर उनके लिए शस्त्र बना,
जिससे अंधकार को हराया।

35.
नहीं था उन्हें देवताओं पर,
श्रद्धा या कोई भरोसा।
वे तो माँ की ममता में,
देखते थे जीवन का रोसा।

36.
विद्यालय का आँगन जब,
परछाईं से भी दूर हुआ।
भीम ने धूप में खड़े रहकर,
अपना पाठ आरंभ किया।

37.
खड़ाऊँ में चलने वाला,
मन से पर्वत समान खड़ा।
जिसे छूना पाप कहा जाए,
वह बना युग की भिन्न धड़ा।

38.
खुले आकाश के नीचे,
जिसने सीखा वर्णमाला।
उसने बंद ग्रंथों को,
खोला अपनी बुद्धि की ज्वाला।

39.
हर तिरस्कार एक पत्थर था,
जिससे उसने दीप बनाया।
भीतर जलती रही ज्वाला,
जिससे युगों को रोशनाया।

40.
“तू क्यों पढ़े?” जब पूछा गया,
भीम ने उत्तर नहीं दिया।
पर उनकी दृष्टि में जलता,
सैकड़ों युगों का व्रत था किया।

41.
हाथों में किताबें थीं,
पर स्पर्श तक उन्हें वर्जित।
पर मन में अडिग शपथ थी,
“मैं बनूँगा वह अर्जित।”

42.
हर पाठशाला का आँगन,
उन्हें पराया लगता था।
पर मन का आँगन स्वर्णमय,
जो उनसे सीखता था।

43.
नहीं चूमा पाँव किसी के,
ना गाया कोई स्तुति गीत।
भीम ने विद्या के मंदिर में,
रचा अपना अपराजित मीत।

44.
बिना पाठ पढ़ाए भी,
कई गुरु मौन हुए।
उनके शील के आगे,
ग्रंथों के अर्थ गौण हुए।

45.
नालंदा, तक्षशिला नहीं मिली,
मिली ज़मीन पथरीली।
लेकिन उसी धरती पर,
जली विवेक की ज्योति नीली।

46.
संघर्ष बना अभिन्न अंग,
हर दिन परीक्षा की रात।
पर शिक्षा बन गई व्रत,
और भीम बने ज्ञानी भ्रात।

47.
वर्जना से भरा वह जीवन,
था जैसे तप का वरदान।
जिसने भीम को बना दिया,
करुणा का सच्चा निदान।

48.
गुरुजन की उपेक्षा भी,
बनी मार्गदर्शन की लौ।
जहाँ द्वार नहीं खुले कभी,
वहाँ उन्होंने दीप बो।

49.
शोषण की कोख से निकला,
भीम, तेजस्वी विचार बना।
बचपन था तमिस्रित लेकिन,
उजासपूर्ण संसार बना।

50.
अब यह खंड विराम ले,
पर भीम की पीर न रुके।
हर पीढ़ी में एक भीम हो,
जो अन्याय को रोक सके॥

अंतिम श्लोक (खंड का समापन)

नालिकाओं से जन्मा नवनीत,
भीम हुआ करुणा का गीत।
दाह हुआ पर दीप बनाकर,
समता-सूर्य उगा नवभीत॥

खंड 2: ज्ञान की ज्वाला
लेखक: सुनील बनारसी

नयन जलों में दीप जलाया,
भीम ने दृढ़ संकल्प रचाया।
“ज्ञान ही मुक्ति का साधन है”,
बुद्धत्व-पथ का मूल बतलाया॥

पद 1
कूप नहीं, पर कूप-सा गहरा,
भीतर ज्ञान का ज्योतिरेखा।
भूख सहा पर ग्रंथ न छोड़ा,
चेतना का पंथ अकेला देखा॥

पद 2
अक्षर-अक्षर व्रत-सा जपा,
मन को ज्ञान-गंगा बनाया।
ब्राह्मण बोले — “तू अयोग्य”,
पर उसने ब्रह्म से ब्रह्म समझाया॥

पद 3
शब्द नहीं, वह मंत्र बना था,
भीतर से उठता प्रकाश।
भीख में शिक्षा लेनी पड़ी,
पर बुद्धि रही तेज निष्कलंकाश॥

पद 4
अंतर में अग्नि जलती थी,
बाह्य चीर में छिद्र हजार।
पुस्तक उसकी पूजा बनती,
हर अक्षर था एक पुकार॥

पद 5
शाला के बाहर खड़ा रहा,
तख्ती, स्लेट, न बैसाखी।
पर मन जैसे साक्षात वेद,
बिना ऋचाओं की राखी॥

पद 6
शब्दों में वह शक्ति भरी,
जो मोक्ष का द्वार दिखाए।
कर्मकांड को काट सके जो,
ज्ञान-नीति का दीप जलाए॥

पद 7
नयन अधीर, पर नेत्रों में,
एक अनोखा ध्येय छिपा।
दूर क्षितिज तक देख रहा वह,
जहाँ न कोई भेद-विपदा॥

पद 8
गुरु की दृष्टि जहाँ ठिठकी थी,
वहीं से उसने मार्ग रचा।
जैसे अंधकार ने देखा,
प्रज्ञा से भरा एक सृजन-विचार॥

पद 9
नमित नहीं वह धन के आगे,
न झुका किसी कुल-मान से।
ज्ञान बना उसका शस्त्र,
लड़ा अज्ञान के त्राण से॥

पद 10
संकल्प-दीपक लेकर चला,
नवचेतना का धर्म रचाया।
भीख नहीं माँगी जीवन की,
बस अक्षरों से दीप जलाया॥

विद्या को केवल साधन ना जाना,
उसे समाज का रथ बनाया।
शोषित की हर सांस में
भीम ने आशा का दीप सजाया॥

विदेश यात्रा व संघर्ष

पद 11
कॉलबा के संकुचित कक्षों में,
अक्षर उसकी साँस बने।
हर पुस्तक में छिपा हुआ था,
उसका ही एक अंश भरे॥

पद 12
अमेरिका की राह पकड़ी,
उड़ चला वह निर्धन तन से।
पर आत्मा स्वर्ण-जयी थी,
प्रज्ञा उगती हर बंधन से॥

पद 13
लंदन में सर्दी काँप रही थी,
भीम की लेखनी जलती थी।
हर पृष्ठ जैसे अग्नि-पाठ,
जहाँ नई विचारधारा पलती थी॥

पद 14
कोलंबिया के गलियारों में,
जहाँ विचारों की खेती थी।
वहाँ दलित का बेटा बैठा,
जहाँ आकाश भी सीमित थी॥

पद 15
“मैं कौन?” यह प्रश्न जब उभरा,
उत्तर मिला — “तू ज्ञान-स्वरूप।”
ना हीन, ना दीन, तू दीपक है,
जो करता तमस का रूप चूप॥

पद 16
हैम्बर्ग की वेदी पर उसने,
प्रश्न उठाया वेदों पर।
“क्या मनु ही अंतिम सत्य है?”
लिखा प्रतिवाद दृढ़ निश्चय कर॥

पद 17
वह ग्रंथ जो पूजे जाते थे,
उसने तर्कों से तौला।
भक्ति नहीं, विवेक था उसके,
शब्दों में सत्य का बोला॥

पद 18
पीठ नहीं पलटी अज्ञान से,
न प्रलोभन से थमा विचार।
सत्य जहाँ भी दिखा उसे,
उसी ओर बढ़ा उसका व्यवहार॥

पद 19
लौटा जब वह पुण्य पथिक,
लेकर विश्व-विवेक समाहित।
भारत की माटी ने पाया,
ज्ञान-गाथा में ब्रह्म संहित॥

पद 20
शब्द नहीं बस ज्ञान बना वह,
उसके विचार — युग-संचार।
भीम नहीं बस शिष्य कोई था,
वह बना गुरु — समता-आधार॥

(पद 21 से 25)

पद 21
न था उसे कुल-वंश का घमंड,
न आडंबर की चाह रखी।
पद-पद पर अपमान मिला पर,
उसने विद्या की राह रखी॥

पद 22
“जाति नहीं मेरा परिचय है,
मैं हूँ एक जिज्ञासु राही।
जिसने पीड़ा को पाथेय किया,
और बुद्धि बनाई साक्षी॥”

पद 23
ग्रंथालयों की दीवारों में,
उसकी प्यास गूँजती जाती।
पन्नों की थकान हर रात,
उसके स्वर में जगती गाथा॥

पद 24
स्नातक की डिग्रियाँ आयीं,
पर न गर्व में किंचित झुका।
कहता — “ज्ञान हो सेवा बनकर,
ना अभिमान का ताम्र-मुखा।”

पद 25
उसकी कलम में वेद समाए,
उसकी दृष्टि में विश्व समाया।
भीम नहीं एक नाम मात्र,
वह युग-विद्या का गान बनाया॥

26.
वाणी की दीपशिखा बनकर,
भीम चला निशीथ जले।
अंध-समाज में सत्य बने वे,
शब्दों से ही दीप बले॥

27.
कांप उठी हर रूढ़ि पुरानी,
जब प्रश्न किया निर्भीक कोई।
शिष्य नहीं, वह स्वयं गुरू था,
जिसने हर मूकता तोई॥

28.
छात्र नहीं, वह चिन्तन-शोधक,
पुस्तक उसके हाथों में।
पर पुस्तक को बाँधा नहीं,
वह चिंतन था बातों में॥

29.
पाठशाला से लेकर संसद,
हर चौखट को पार किया।
पदचिन्हों में वर्णमाला थी,
जिसने शब्दाधार किया॥

30.
साक्षरता को अर्थ दिया जो,
वह केवल अक्षर न रहा।
ज्ञान स्वयं था नमन जिसे,
भीम वही युगांतर बना॥

31.
कॉलबा की वह सीढ़ियाँ,
स्वाभिमान की सीढ़ बनीं।
जहाँ दलित भी खड़ा दिखा,
ज्ञान-ध्वजा ले अधीर गिनी॥

32.
क्लासरूम के कोनों में भी,
उनकी छाया बोल उठी।
“अधिकार नहीं भिक्षा मेरी”,
उनकी दृष्टि डोल उठी॥

33.
न्याय-शास्त्र, धर्मशास्त्र सब,
एक एक कर पढ़ डाला।
भीम न केवल ज्ञानी थे,
वो थे चेतन का उजाला॥

34.
रात्रि की नींदें छोड़ उन्होंने,
प्रभातों में दीप भरे।
ग्रंथालय के मौन सत्र में,
आत्मा के पंख खरे॥

35.
लंदन में जब बर्फ पड़ी थी,
भीतर भीम दहक रहे थे।
नहीं अग्नि से, विद्या से वे,
सोयी जाति को जग रहे थे॥

36.
“अरे शूद्र! तू ज्ञान करेगा?” —
यह प्रश्न उन्हें चुभते थे।
उत्तर में हर कक्षा का,
पाठ स्वयं बन झुकते थे॥

37.
किसी पाठ्य नहीं झुके वो,
ना ही गुरु की दृष्टि में।
वे तो चल रहे थे अपने,
ध्येय, तपस्या, सृष्टि में॥

38.
ब्राह्मणों की परिभाषाएँ,
थीं उनके लिए अधूरी।
ज्ञान कहाँ से जन्म लेता?
उनसे न पूछे दूरी॥

39.
ग्रंथ नहीं, वह जीवित शास्त्र थे,
उनके पृष्ठ नहीं पलटे।
वो चलती-फिरती वेदना थे,
जो पिघले नहीं, पर जलते॥

40.
कभी प्रश्नों से घिर जाते,
पर उत्तर में और बढ़ते।
शिक्षा के नूतन अध्याय,
उनके नामों से जुड़ते॥

41.
कॉलबा से कोलंबिया तक,
एक ही लक्ष्य मन में रहा।
“समानता ही श्रेयस्कर है”,
यह दीपक अंतर में बहा॥

42.
गुरुकुलों के मोहजाल को,
विवेक से काटा उन्होंने।
विद्या नहीं दया की भिक्षा,
यह स्वर बांटा उन्होंने॥

43.
जो अक्षर नहीं छूने देते,
वो उनके ग्रंथ पढ़ गए।
भीम की उस तपस्या से,
मंत्र पुरोहित गढ़ गए॥

44.
वेदी नहीं, पर वह भीम-मन,
ज्ञान-यज्ञ का हवन हुआ।
अक्षर-अक्षर में समता थी,
हर पंक्ति स्वयं प्रवचन हुआ॥

45.
नहीं शिष्य थे, मार्गदर्शक,
उनके बोधि वचन बने।
प्रवृत्ति से तप, निवृत्ति से ज्ञान,
ऐसे मंत्र रचयित बने॥

46.
सत्य कहूँ तो शब्द हारे,
उनकी जिज्ञासा के सम्मुख।
शंका की जड़ें हिलीं,
जब तर्क खड़े हों दमखम युक्त॥

47.
विश्वविद्यालयों की छाया में,
वह वटवृक्ष समान खड़े।
हर आलोचक को मौन किया,
जब उन्होंने विवेक जड़े॥

48.
ज्ञान नहीं था उनके लिए,
सिर झुकाकर चुप रहना।
बल्कि वह था दृष्टि बुनना,
और अन्याय को कह देना॥

49.
छात्र नहीं, वह दीपज्योति थे,
पंथ में जो राह दिखाए।
विद्या के उस पथिक को,
कौन समय में बाँध पाए?

50.
खंड यही अब विराम पाता,
पर ज्ञान-ज्योति अभी जलती।
भीम की वह मशाल बनी,
जो युगों-युगों तक पलती॥

समापन पद

जिसने पोथियों से पंख बुना,
द्रवित नयन से विद्या चुनी।
भीम की यह ज्ञान-ज्वाला ही,
आज अमरता की रेखा बनी॥

खंड 3: समानता का संग्राम

(पद 1–50)

पद 1
शंख नहीं, पर क्रांति थी वो,
मंत्र नहीं, पर पंथ था वो।
भीम चला उस भूमि पर,
जहाँ मनु का तंत्र प्रबलतम था वो॥

पद 2
मूक स्वरों की पीर सँजोकर,
भीम उठे, नव मार्ग खोला।
“मैं भी मानव” — यह उद्घोष,
वंचितों का स्वर था बोला॥

पद 3
चावदार-तालाब पर जाकर,
किया जल का पूजन-प्रेम।
नहीं माँगी दया किसी से,
बस समता का सौगंध देम॥

पद 4
मंदिरों की देहरी काँपी,
काँपे पुरोहित, कांपे ग्रंथ।
भीम ने पत्थर को चेताया —
“देव भी सुनें आज यह कंठ।”

पद 5
“जाति नहीं धर्म का व्रण है,
यह विवेक का अपघात।”
भीम लिखे जब ‘जाति उच्छेदन’,
हिला दिया सनातन गात॥

पद 6
लेखनी उनकी वज्र बनी थी,
हर अक्षर में आक्रोश जगा।
न्याय बना उनका संकल्प,
अधिकारों को स्पर्श मिला॥

पद 7
जन-जन में चेतन अंगार,
भीम बने समता का सार।
हाथ नहीं थे शस्त्र लिए,
वाणी थी पर प्रखर प्रहार॥

पद 8
“तू शूद्र नहीं, तू मानव है”,
यह स्वर गूँजा गाँव-गाँव।
हृदयों में जो बँटवारा था,
वह भी काँपा, जागा चाव॥

पद 9
न्याय, अहिंसा, बंधुत्व का दीप,
भीम ने वंचित को थमाया।
अश्रु-रक्त से लथपथ थे जो,
उन्हें सम्मान का गीत सुनाया॥

पद 10
तिरस्कार के तप्त तले,
जिन्हें वर्षों तक रौंदा गया।
भीम ने उनको छाँव दिया,
जहाँ साहस का बीज उगा॥

पद 11
हरिजन शब्द से न वह प्रसन्न,
स्वाभिमान उसे प्रिय रहा।
“नाम नहीं, अधिकार दो”,
यह उद्घोष सतत निस्वार्थ बहा॥

पद 12
न्यायालयों से सड़कों तक,
भीम की हुंकार चली।
पग-पग पर चेतावनी बनकर,
मानवता की पुकार चली॥

पद 13
“अस्पृश्यता है पाप महान”,
भीम ने यह नीति रची।
मनुवादी ढांचे के सम्मुख,
सत्य की मशाल खड़ी रखी॥

पद 14
जिसे कभी जल पीने का,
भी अधिकार नहीं मिला।
अब वही समता का पुजारी,
हर अंत:करण में खिल उठा॥

पद 15
नमन करें उस पुरुषार्थ को,
जिसने मौन को स्वर दिया।
शोषण की शृंखला को काटा,
और समता का पथ रचा॥

पद 16
नहीं कोई ताज सिर पर था,
ना सिंहासन, ना चक्रवर्ती।
भीम बने दलितों के स्वप्न,
वाणी जिनकी अग्निपर्वती॥

पद 17
अछूत नहीं, अजात नहीं,
भीम ने सबको स्मृति दी।
“मानवता ही धर्म हो”,
यह संकल्प कभी न बिसरी॥

पद 18
सभा में बोल उठा सच,
जिसे लोग वर्षों से छुपाते थे।
भीम ने वह प्रश्न उठाया,
जिससे पत्थर भी पिघल जाते थे॥

पद 19
चरणों में जो नत थे सदियों,
आज खड़े होकर बोले।
“भीम हमारा दीप है”,
यह स्वर अम्बर तक डोले॥

पद 20
भेद-भाव की बंधी दीवारें,
भीम ने आघात से तोड़ीं।
सत्ता-सिंहासन चकित हुए,
समता की रचना जोड़ी॥

पद 21
“मनुष्य-मनुष्य में अंतर कैसा?”,
भीम ने प्रश्न उठाया।
धर्म नहीं यदि समता दे,
तो वह धर्म भी असत्य ठहराया॥

पद 22
अनुयायी नहीं, नेतृत्व किया,
भीम चल पड़े अग्रदूत।
जहाँ भी अन्याय दिखा उन्हें,
वहाँ बनें वे धर्म-सूत॥

पद 23
भीम नहीं, कोई देव नहीं,
पर कर्म उनके दिव्य रहे।
उनकी दृष्टि जहाँ पड़ी,
अंधियारे भी रश्मि सहे॥

पद 24
ग्राम और नगरों के बीच,
जहाँ कोई नहीं बोलता था।
भीम पहुँचे, चेतना बाँटी,
जो कभी स्वप्न भी न देखता था॥

पद 25
द्रोणों की शिक्षा में नहीं,
अब भीम की बारी थी।
एकलव्य की संतान उठी,
सत्य ही अब असली धारी थी॥

पद 26
नव-संस्कृति का बीज पका,
भीम की वाणी में रस था।
वेदों से ऊपर जो बोले,
उसका ही तो विश्वास था॥

पद 27
पुरातन ग्रंथों को पढ़ा,
पर आँखें इतिहास पर रखीं।
भीम ने भविष्य लिखा,
जहाँ सबकी आशाएँ टिकीं॥

पद 28
तुम चाहे जितना बाँटो,
मन को बाँध सका कौन?
भीम ने मन को मुक्त किया,
और दिया ‘मनुष्यता’ का दान॥

पद 29
क्रांति की लहर चली जब,
भीम ही उसका तटबंध बने।
संघर्षों से पथ प्रशस्त किया,
वंचितों के परमबंध बने॥

पद 30
इस खंड का स्वर नहीं रुकेगा,
जब तक अंतिम जन बोलेगा।
भीम की जयघोष बनी रहेगी,
जब तक सूरज रोज़ डोलेगा॥

31.
न्याय नहीं था केवल शब्द,
भीम ने उसे जीवित किया।
हर पीड़ित की आँखों में
स्वत्व का दीप प्रतिष्ठित किया॥

32.
सभा जहाँ मौन साधती थी,
वहाँ भीम ने स्वर फेंका।
“मैं जो हूँ, वही सत्य है”,
यह कहकर मूल हिला भेंका॥

33.
“मनुष्य” शब्द नहीं मात्र,
वह चेतना का घोष बना।
भीम ने छूते ही उसे,
आत्मगौरव का जोश बना॥

34.
शोषक बोले — “वह विधर्मी”,
भीम बोले — “मैं मानव हूँ!”
“तेरे प्रश्न नष्ट कर देंगे”,
उत्तर मिला — “स्वतंत्र जन हूँ!”

35.
किसी कोठरी में जन्म लिया,
पर चेतन नभ से ऊँचा था।
भीम का यह संघर्ष देख,
हर पत्थर भी गूंजा था॥

36.
सड़क नहीं, संकल्प बने,
जहाँ भीम ने पाँव धरे।
ईंट नहीं, आत्मा रख दी,
हर चौकठ पर दीप भरे॥

37.
वंचितों के हर आँसू में,
भीम का प्रतिबिंब दिखा।
जहाँ दया भी दूर रही,
वहाँ समता का चिंतन लिखा॥

38.
अस्पृश्यता पर प्रहार किए,
ना तलवार, ना शस्त्र लिए।
शब्द ही उनके अस्त्र बने,
वाणी में भी शौर्य जिए॥

39.
पदचिन्ह जहाँ भी पड़ते थे,
क्रांति की भाषा बन जाती।
भीम का संकल्प सुनते ही,
घंटियों में आग बज जाती॥

40.
“जिस धर्म में अपमान मिले,
वह धर्म नहीं — व्यापार है।
समता ही हो मूल जहाँ,
बस वही सच्चा संहार है।”

41.
भीम ने जो पथ दिखाया,
वह क्रोध नहीं — विवेक था।
जिसने बंटे समाज को,
फिर से मानव-एक लेख था॥

42.
झोपड़ियों से लेकर संसद,
हर मोर्चे पर स्वर गूँजे।
भीम अकेले थे परंतु,
उनसे करोड़ों मन जुड़ें॥

43.
अत्याचार सहने वाला,
भी अब प्रश्न पूछता है।
यह अधिकार का दीप वही,
जो भीम ज्योति से पूजता है॥

44.
“मंदिरों में अधिकार नहीं,
तो उन देवों को त्यागो।
जिसने छुआ भी न तुम्हें,
उन मूर्तियों से भागो॥”

45.
“तू न निम्न है, न दुर्बल,
बस यह भ्रम तू छोड़ दे।
जिस दिन खुद को पहचान ले,
हर ज़ंजीर तू तोड़ दे।”

46.
क्रांति की भाषा सरल नहीं,
पर भीम ने सहज बना दी।
हर जन को गूंजने लायक,
अक्षरों में शक्ति सजा दी॥

47.
न्यायालय भी हिल उठे थे,
जब भेदभाव प्रमाण बने।
भीम ने तब समाज रचा,
जहाँ समान विधान बने॥

48.
“जाति नहीं, वह दंश है”,
भीम ने यह उद्घोष किया।
“जो बाँटे मानवता को,
वह अधर्म है, दोष किया।”

49.
हर द्वार पर लिख दी इबारत,
“मैं भी मनुज — तू भी सम!”
भीम का यह उद्घोष बना,
वंचितों में स्वर का रथ रम॥

50.
खंड समाप्त नहीं होता यहाँ,
यह आंदोलन अब भी चलता।
जहाँ भी अन्याय उठता है,
भीम का दीप वहीं जलता॥

खंड समापन श्लोक

शंखनाद ना कर पाया जब,
भीम ने कलम बजाई थी।
समानता का संग्राम वही,
जिसमें पीर-शक्ति समाई थी॥

खंड 4: संविधान का संकल्प
लेकक: सुनील बनारसी

(पद 1–50)

पद 1
न मूर्ति बने, न महिमामयी,
भीम बने भारत की वाणी।
लेखनी में लिपटा भविष्य,
विधि-विधान की अमिट कहानी॥

पद 2
अट्टालिकाओं में जब बैठे,
नव-भारत के शिल्पकार।
भीम खड़े थे न केवल नेता,
बल्कि युग का सार-निसार॥

पद 3
द्रोणों की सभा में जाकर,
एकलव्य ने हुंकार भरी।
“न्याय नहीं जो सबको दे,
वह वेद-कथा अधूरी रही॥”

पद 4
कलम बनी थी शस्त्र समान,
हर अनुच्छेद तपस्वी संकल्प।
जाति, वर्ग, लिंग, धर्म सबको,
दिया समता का स्वराज्य विकल्प॥

पद 5
“न्याय”, “स्वतंत्रता”, “बंधुत्व” के,
सूत्र पिरोए मंत्र सदृश।
लोकतंत्र बना लोकधर्म,
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-वृत्तिश॥

पद 6
“हम भारत के लोग” लिखा,
किसी राजा के नाम नहीं।
संविधान बना जन-प्रतिबिंब,
सत्ता का कोई दाम नहीं॥

पद 7
हर अनुच्छेद में पीड़ा घुली,
हर पंक्ति में आँसू बोले।
भीम की आत्मा गूँज रही थी,
जब संसद की घंटियाँ डोले॥

पद 8
धर्मग्रंथों से ऊपर उठकर,
लिखा एक मानव धर्म शास्त्र।
जहाँ ब्राह्मण, शूद्र नहीं कोई,
सबको मिला मानवीय पथास्त्र॥

पद 9
न्याय नहीं जो सबको छुए,
वह विधि अधूरी कहलाए।
भीम ने लिखा वह संविधान,
जो जन-मन को अपनाए॥

पद 10
सभा में बैठे धुरविरोधी,
पर भीम अडिग रहे सदा।
नीति नहीं, पर न्याय बने,
यह था उनका आत्म-निवेदना॥

पद 11
“जो शोषित हैं, उन्हें पहले दो”,
भीम की यह प्रथम शपथ।
आरक्षण केवल नीति नहीं,
था समता का स्वस्ति-पथ॥

पद 12
कठिन विरोध, विषवाणी भी,
भीम के पथ में डाली गई।
पर उनके मौन में गूँजी,
एक युगांतकारी गाथा नई॥

पद 13
विधि की भाषा में उन्होंने,
संवेदना का भाव लिखा।
कठोर तर्कों में भी छिपा था,
एक करुणा का तेज सखा॥

पद 14
संविधान सभा की वह कुर्सी,
आज भी इतिहास में जलती।
जहाँ बैठा एक पुत्र भारत का,
जिसकी दृष्टि कभी न मचलती॥

पद 15
अखंड भारत के पटल पर,
भीम ने जो रेखा खींची।
वह रेखा नहीं, चेतना थी,
जिसमें न जात, न संकीर्ण वींची॥

पद 16
“एक भारत, एक विधान”,
भीम का यह घोष रहा।
जहाँ हर जन समान गिना जाए,
न कोई छोटा, न कोई महा॥

पद 17
राजा नहीं, पर वंशजों से,
भीम को उत्तर देना पड़ा।
“हम शूद्र को कैसे दें अधिकार?”
यह प्रश्न बार-बार खड़ा॥

पद 18
पर भीम न झुके, न रुके,
उनकी लेखनी शंख बनी।
जब संविधान बना तो उसमें,
हर वंचित की गाथा जनी॥

पद 19
“कानून वही, जो न्याय करे”,
भीम ने यह प्रतिज्ञा ली।
धर्म वही, जो करुणा दे,
अहंकार न जिसमें जी॥

पद 20
हर विधि में मूल्य समाहित था,
हर पंक्ति थी अनुभव-स्नात।
वह संविधान नहीं केवल था,
था युग-धर्म का परिपाठ॥

पद 21
ना कोई अल्प, ना कोई बहुसंख्यक,
भीम ने यह भेद मिटाया।
“संविधान सभी का है”,
यह उद्घोष जग में गाया॥

पद 22
मौलिक अधिकार, कर्तव्य सुस्पष्ट,
भीम की दृष्टि समान रही।
नवभारत की नींव पड़ी,
जहाँ विवेक की मान रही॥

पद 23
शब्दों में सत्ता नहीं रही,
अब सेवा का सूत्र जुड़ा।
भीम ने शासन को परिभाषित किया,
जहाँ नागरिक सर्वोपरि खड़ा॥

पद 24
विधानसभा के कोनों में,
जब संदेह के स्वर उठते थे।
भीम वहीं आत्मबल से,
प्रकाश की गूंज करते थे॥

पद 25
“जाति हटाओ, वर्ण मिटाओ”,
यह नहीं सिर्फ नारा था।
भीम की लेखनी में समता,
हर पंक्ति में धारा था॥

पद 26
“वोट नहीं, चेतना चाहिए”,
यह भीम का संकेत रहा।
लोकतंत्र जनसंख्या नहीं,
बल्कि न्याय का अभिप्रेत रहा॥

पद 27
गाँधी की हत्या की छाया में,
संविधान पूर्ण हुआ एक दिन।
भीम ने कहा — “हम रोए नहीं,
बस बनाएँ ऐसी सृष्टि बिन।”

पद 28
सविधान सभा में तालियाँ,
भीम के मौन पर बजी थीं।
ना कोई वंदन, ना अभिनंदन,
फिर भी युग की दृष्टि सजी थीं॥

पद 29
“हमने संविधान तो रचा,
पर चलाना होगा आप सभी को।”
यह कह भीम चल दिए,
जैसे कोई दीप दे जाए धुनी को॥

पद 30
अब वह पुस्तक हाथों में है,
पर पृष्ठ भीम के व्रत हैं।
हर अक्षर उनकी चेतना है,
हर अनुच्छेद उनके श्रम-पथ हैं॥

31.
सिर्फ कागज़ नहीं थे पन्ने,
हर शब्द में सपना था बसा।
भीम की लेखनी बोली थी,
“यह भारत नहीं अब वही पुराना”॥

32.
अनुच्छेद नहीं नियम मात्र,
वे तो आत्मा के स्वर थे।
हर पंक्ति में समता बसी,
हर विराम में अधिकारों के दर थे॥

33.
कहीं वंचित का स्वर मिला,
कहीं श्रमिक का श्रम लिखा।
कहीं नारी की गरिमा थी,
कहीं बालक का जीवन रेखा॥

34.
भीम ने जब कलम उठाई,
वर्णाश्रम की नींव डोली।
कानून की भाषा बनी तब,
जिसमें न राजा, न कोई टोली॥

35.
संसद में था एक अकेला,
पर युगों की शक्ति साथ थी।
भीतर आग, बाहर धैर्य,
उनके सत्य में सौगंध थी॥

36.
“मैं नहीं बनाऊँगा ऐसा ग्रंथ,
जो फिर किसी को दास बनाए।
जिसे पढ़कर फिर एक मानव,
दूसरे को नीचा बताए”॥

37.
“जो अधिकार सबको न दे,
वह नीति नहीं, वह पाप है।
संविधान वही होगा मेरा,
जो न्याय में निष्पाप है”॥

38.
ब्रह्मसूत्रों से मुक्त किया,
वेदों के बोझ हटा डाले।
जन-मन को जो छू न सके,
वे सारे विशेषाधिकार टाले॥

39.
“संविधान” एक घोष नहीं,
वह जन-जागरण की वाणी है।
जिसमें कोई ईश्वर नहीं,
बस जनता की ही कहानी है॥

40.
भीम ने जिस भाषा में लिखा,
वह भयमुक्त, निर्मल, निर्भय थी।
हर व्याकरण में गूंज रही,
स्वतंत्र भारत की जय थी॥

41.
धर्म-ग्रंथ जो बाँटते थे,
भीतर-भीतर विष की धार।
भीम ने दी विधि ऐसी,
जिसमें समता है आधार॥

42.
“धर्म वही जो जोड़ सके”,
यह मूल विचार लिखा गया।
जिसने लाठी नहीं उठाई,
पर विधि से युद्ध सधा गया॥

43.
संविधान बना था दीपक,
न्याय, विवेक और प्रेम से।
कानों ने नहीं, दिल ने सुना,
उस गूंजते हुए श्रम-से॥

44.
जो प्यासे थे अधिकारों को,
जो डरते थे बोलने से।
भीम ने उन्हें स्वर दिए,
संविधान के बोलने से॥

45.
ना कोई ऊँचा, ना कोई नीचा,
सबकी संज्ञा — “नागरिक”।
भीम ने गढ़ा वह शब्द,
जो कर दे राजनीति भी नैतिक॥

46.
आँखों में उनकी नींद न थी,
बस नींव थी, स्वप्नों की।
भारत तब संविधान बना,
वाणी से, ना शस्त्रों की॥

47.
सभागृहों में बैठकर भी,
भीतर रणभूमि चलती थी।
हृदय ने युद्धों को जिया,
पर लेखनी शांत जलती थी॥

48.
“यह मेरा उत्तर नहीं,
यह तो युगों का उत्तर है।
मैं नहीं बना रहा कानून,
यह तो जन का मंतर है”॥

49.
भीम ने जब अंतिम शब्द लिखा,
कलम थकी पर दीप जला।
एक ग्रंथ नहीं — वह दीपशिखा,
जो हर शोषित तक चला॥

50.
संविधान ना केवल विधि है,
वह भीम का जीवित स्वप्न।
हर जन-गण की चेतना में,
वह बनकर जीता है तप॥

खंड समापन श्लोक

अक्षरों में आत्मा रख दी,
संविधान नहीं — संवेदना लिखा।
भीम ने जन-मन के भीतर
नव जागरण का सेतु बुना॥

खंड 5: बुद्ध की शरण में
लेकक: सुनील बनारसी

(पद 1–50)

पद 1
जब अन्याय का दीप बुझा था,
तब करुणा का दीप जला।
जब मनुस्मृति मौन पड़ी थी,
तब धम्म-संगीत चला॥

पद 2
भीम खड़ा उस चौराहे पर,
जहाँ धर्म भी व्यापार हुआ।
वेदों के भीतर विष दिखा,
श्लोकों से भी संहार हुआ॥

पद 3
ब्राह्मण बोले — “सब विधाता”,
भीम बोले — “बस मानव हूँ।”
शरण लिया जिस बुद्ध-पथ का,
वह प्रश्न नहीं — समाधान हूँ॥

पद 4
“मैं न मसीहा, न कोई ऋषि,
बस पीड़ा का सार बना।”
जिसे किसी ने सुना न पहले,
उस मौन का हुंकार बना॥

पद 5
नागपुर की भूमि पर फिर,
बुद्ध का दीप पुनः प्रज्वलित।
तीन शरणें, पंचशील की,
बानी थी शुभ, मन वंदित॥

पद 6
ना पुनर्जन्म, ना प्रेत-विचार,
ना वर्ण, ना कोई परिभाषा।
धम्म जहाँ हो समता का दीप,
वही सत्य की हो अभिलाषा॥

पद 7
दस हजारों ने त्याग दिया था,
शृंखलाओं का मूल व्रण।
भीम बने नवयान के प्रवक्ता,
प्रज्ञा का वह निर्मल कण॥

पद 8
“नहीं दया, मैं अधिकार माँगता”,
भीम का था यह घोष महान।
धम्म था शांति की भाषा,
नहीं किसी भय या त्राण का दान॥

पद 9
शरीर थका, पर आत्मा जागी,
कर्मों में शून्यता का भाव।
बुद्धत्व की शरण सदा थी,
भीम बना धम्म का बहाव॥

पद 10
वेदों की वाणी ठहरी थी,
पर धम्म की गाथा बहती।
भीम जहाँ गए, वहाँ करुणा,
हर हृदय की काया कहती॥

पद 11
“ना ईश्वर, ना अवतार कोई,
बस तृष्णा का अवसान हो।”
धम्म का अर्थ — जागरूकता,
भीम ने वह निर्माण बो॥

पद 12
त्रिरत्नों की वह घोषणा,
नवयुग का उद्घोष बनी।
बुद्ध, धम्म, संघ के पथ में,
भीम की चेतना रची-पगी॥

पद 13
ना यज्ञ, न कोई कर्मकांड,
न स्नान, न बलिपूजन।
धम्म था — भीतर का अनुभव,
नहीं बाह्य वस्त्र-सज्जा धन॥

पद 14
भीम बोले — “यह धर्म नहीं,
यह मानवता की साधना है।
जहाँ अहिंसा का दीप जले,
वही बोधि की कामना है।”

पद 15
संघ बना नये रूप में,
ना कोई ऊँच, ना कोई नीच।
जहाँ वाणी समान बोले,
हर दृष्टि में समता बीच॥

पद 16
नवयान की वह धारा फैली,
ग्राम, नगर, जनपद चले।
हर तृषित ने दीक्षा पाई,
भीम के पदचिह्नों तले॥

पद 17
चक्र नहीं, पर धर्मचक्र था,
जिसे भीम ने गति दी।
बुद्ध की वह शांत छवि,
भीम की चेतना बन गई॥

पद 18
मंगल सूत्र नहीं बाँधा,
भीम ने नव प्रतिज्ञा की।
“न पत्नी गुलाम बने,
ना पति को हो स्वामी की पी।”

पद 19
स्त्री-पुरुष सम, बंधु सभी,
धम्म में न कोई भेद रहा।
भीम ने वहीं घोषणा की,
जहाँ युगधर्म पुनः जगा॥

पद 20
“नरक नहीं, न स्वर्ग कहीं,
बस जीवन का बोध करो।
अब जिओ ऐसे कि मानवता,
हर आह्वान में जोत भरो।”

पद 21
भीम ने दीक्षा दी नहीं,
मानवता को पुनः जगाया।
नवयुग की परिभाषा रची,
धम्म को जीवन में समाया॥

पद 22
हर दीक्षा एक दीप बनी,
हर अनुयायी धम्मकथाकार।
भीम अकेले नहीं रहे,
हजारों बने अब विचार॥

पद 23
धम्म का अर्थ — जागरण है,
जिसमें मोह न, लोभ न काम।
जहाँ विचार हो शुद्ध सदा,
और बुद्धत्व हो जन-धाम॥

पद 24
भीम ने कहा — “अब मैं शांत हूँ,
न मठ बनाओ, न राज बनाओ।
बस मेरी वाणी में बुद्ध हो,
और करुणा से दीप जलाओ।”

पद 25
वेदों की आग जहाँ बुझी,
वहाँ धम्म की वर्षा आई।
भीम बने बादल समान,
और जीवन की प्यास बुझाई॥

पद 26
नवनिर्माण का घोष यही था,
“धम्म” से भारत को जोड़ो।
न बंधन दो, न भय दिखाओ,
बस सत्य, करुणा को मोड़ो॥

पद 27
मंदिरों के पट बंद हुए,
पर बुद्ध की प्रतिमा खड़ी रही।
भीम ने न मूरत बनाई,
पर चेतना जगती रही॥

पद 28
ना कोई प्रेत, न कोई पूजा,
ना ही स्वर्ग की आस रही।
धम्म वही था जहाँ विचार,
और तृष्णा की ह्रास रही॥

पद 29
विनय, शील, प्रज्ञा का रथ,
भीम ने भारत को दिया।
संघ, सद्धर्म, बोधिपथ का,
प्रकाशमय नक्षत्र जिया॥

पद 30
भीम की वह अंतिम वाणी,
“मैं धम्म हूँ, मैं बोधि वाक्य।
मैं न कोई राजा बना,
बस मानव का सत्य वाक्य।”

पद 31
बोधिवृक्ष नहीं उगाया,
पर चेतन बीज बो दिए।
भीम गए, पर पीछे उनके,
करुणा के वन हो लिए॥

पद 32
धम्म नहीं कोई सम्प्रदाय,
भीम ने यह स्पष्ट कहा।
“यह तो है मानव धर्म —
जिसमें न हिंसा, न छल रहा।”

पद 33
दस हजारों की दीक्षा ली,
पर भीम का हाथ न काँपा।
हर मस्तक पर उन्होंने लिखा —
“अब कोई न होगा शापित, बँधा।”

पद 34
बुद्ध के वाक्य, भीम की लेखनी,
एक ही चेतना के स्वर।
धम्म बना नया समवेत राग,
करुणा से परिपूरित कर॥

पद 35
अब जो दीप जला समाज में,
वह दीपक भीम-बुद्ध का है।
जिसमें न अंधकार बचे,
वह नवयुग का सूत्रपथ है॥

पद 36
संघ बना न कोई सिंहासन,
ना कोई मठ की माया थी।
हर अनुयायी था दीप समान,
भीम की यह काया थी॥

पद 37
“न कोई गुरु, न दास कोई”,
धम्म की वाणी यह कहती।
जहाँ विवेक ही श्रेष्ठ हो,
वहीं चेतना बहती॥

पद 38
भीम ने वह चक्र घुमाया,
जिसमें हिंसा का नाम न हो।
बुद्धत्व जहाँ विचार बने,
और भेदभाव का काम न हो॥

पद 39
“ना कोई तिलक, न जनेऊ”,
भीम की भाषा में सत्य रहा।
“धम्म वो जो भूख मिटाए,
ना केवल मंत्रों से कृत्य कहा।”

पद 40
भीम जहाँ गए, दीप जले,
ना आरती, ना दुर्गंध वहाँ।
केवल विचारों की सुगंध थी,
और करुणा का स्पंदन जहाँ॥

पद 41
धम्म बना दर्पण ऐसा,
जिसमें मानव खुद को देखे।
ना आत्मा, ना पाप-पुण्य,
सिर्फ सन्मार्ग पर पग रेखे॥

पद 42
बुद्ध ने जो मौन रचा था,
भीम ने उसे वाणी दी।
वह मौन नहीं अब संकल्प बना,
जिसमें चेतना जागी थी॥

पद 43
“जाति नहीं, सिर्फ कर्तव्य देखो”,
भीम ने हर मंच कहा।
“जो श्रम करे, वही श्रमण है,
धम्म का दीप वही रहा।”

पद 44
“दया नहीं, समता चाहिए”,
यह उद्घोष नया इतिहास बना।
भीम के मुख से जब निकला,
वह पत्थर भी संवेदन बना॥

पद 45
धम्म कोई रीति नहीं,
ना कोई पूजा का विधान।
धम्म है चेतन-मानवता,
जिसमें न्याय हो हर जान॥

पद 46
नवयान कोई संप्रदाय नहीं,
वह तो युग की आत्मा था।
भीम नहीं कोई गुरु बना,
बल्कि पीड़ा का नाम था॥

पद 47
धम्म जहाँ भी जीवन हो,
जहाँ समता का दीप जले।
भीम ने वहीं ध्वजा उठाई,
और नवचेतना साथ चले॥

पद 48
“न मैं उद्धारक, न अवतारी”,
भीम ने सबको ये बताया।
“मैं बस उस मानव का स्वर हूँ,
जिसे सदियों ने ठुकराया।”

पद 49
शरीर चला, पर दीप जला,
धम्म बना वह व्रत महान।
हर कंठ में बुद्ध की वाणी,
हर आँख में जीवन-विधान॥

पद 50
अंत नहीं यह धर्मचक्र का,
यह तो शुरुआत बनी रहे।
भीम के इस धम्म-पथ से ही,
मानवता सदा सजी रहे॥

खंड समापन श्लोक

नवयुग का था दीक्षानायक,
भीम — प्रज्ञा का आभास।
उसके पदचिह्नों से आज भी,
चलती करुणा की उज्ज्वल त्रास॥

खंड 6: अमर विचारक
लेखक: रचनाकार: सुनील बनारसी
—(पद 1–50)

1.
शरीर थमा, पर शब्द न रुके,
काल थका, पर कालजयी हुआ।
मरण जिसे छू न सका कभी,
वह भीम — विचारमयी हुआ॥

2.
शीत दिसंबर की संध्या थी,
धरा मौन, दिशाएँ स्थिर।
परंतु एक चेतना उठी थी,
जो काल-व्यूह को कर गई विर॥

3.
भीम नहीं एक मृत्यु कथा,
वह युग चेतना की गति रहे।
जीवित हैं वह संविधान में,
हर न्याय-दीप की स्फुरति रहे॥

4.
कब्र नहीं — वह दीप समान,
हर अंतःकरण को दीप्त करे।
संवेदन हो या क्रांति पुकार,
भीम वहाँ सदैव उपस्थित रहे॥

5.
बुद्ध-पथ का वह दीपज्योति,
जो बुझकर भी ज्योतिर्मय रहा।
जिसके स्वरों में करुणा बहती,
पराजित न हुआ, विजयमय रहा॥

6.
प्रस्तावना नहीं वह जीवन था,
जो अंतहीन संवाद बना।
भीम की चेतना वह धारा,
जो युगों का विस्तार बना॥

7.
न कोई संप्रदाय बना वह,
ना कोई पूजा की छाया।
वह तो न्याय का बीज रहा,
हर चेतन में जो उग आया॥

8.
“मैं मरा नहीं” — यह नहीं दावा,
बल्कि वह जीवन का तत्व रहा।
जहाँ भी अंधकार दिखा,
भीम वहीं प्रकाशवत रहा॥

9.
संविधान की हर धारा में,
भीम का रक्त प्रवाहित है।
ना केवल विधानों में,
बल्कि जनमन की प्रार्थित है॥

10.
बालक जब अक्षर जोड़ता,
श्रमिक जब अधिकार माँगता।
भीम की स्मृति उग आती,
हर चुप्पी में स्वर जागता॥

11.
भीम कोई आदर्श न केवल,
वह व्यवहार की गरिमा था।
जो दलित नहीं, समता का दूत,
वह मानवी-धर्म की सीमा था॥

12.
तू मठों में मत खोज उसे,
ना ही मूर्तियों की छाया में।
वह है हर संविधान में,
हर श्रमिक की काया में॥

13.
ना अंत्येष्टि थी, ना अंतिम संस्कार,
बस एक दीप हस्तांतरित हुआ।
जो चेतना से युक्त रहा,
और मानवता का पंथ बना॥

14.
हर आंदोलनों की जड़ में,
हर क्रांति की साँस में भीम।
वह चेतक की नहीं परछाईं,
बल्कि स्वयं युग का था रश्मि-संधीम॥

15.
जिसने शोषण का अर्थ मिटाया,
और शास्त्रों को दृष्टि दी।
भीम नहीं केवल विचारक था,
वह समय की सृष्टि थी॥

16.
राजनीति में भीम था मौन,
किंतु न्याय की वाणी था।
राजसिंहासन छोड़े उसने,
पर जन-गाथा की कहानी था॥

17.
हर सत्ता जब थक जाती है,
तब भीम का पथ स्मरण हो।
जहाँ धर्म और नीति लड़े,
भीम वहाँ शांति का धन हो॥

18.
उसके शब्दों में शस्त्र छिपा था,
और मौन में महासमर।
भीम नहीं बहस का हिस्सा था,
बल्कि क्रांति का प्रथम प्रहर॥

19.
वह पत्थर नहीं — दिशा थी,
वह अक्षर नहीं — महाकाव्य।
भीम नहीं एक नाम भर,
बल्कि युगान्तर का प्रतिश्रव्य॥

20.
हर दलित के आक्रोश में,
हर वंचित की पीर में भीम।
वह आंसू नहीं, साहस था,
जिसने इतिहास रचा था सीम॥

21.
जिसे समता का अर्थ न समझे,
वह भीम को जान नहीं पाया।
वह हर वर्ग की पीड़ा था,
हर स्त्री का अव्यक्त माया॥

22.
भीम कहीं गया नहीं,
बस बदल लिया स्वरूप।
अब वह पुस्तक में है,
या संविधान के शब्दरूप॥

23.
जहाँ भी ‘न्याय’ का स्वर रुका,
वहाँ भीम फिर गूँज उठा।
शब्द नहीं, अब शपथ बना है,
जो अन्याय से दूर जता॥

24.
ना वह मूर्ति, ना वह नारा,
ना केवल जयजयकार था।
भीम वह ऊर्जा बन गया,
जो हर पीड़ित का आधार था॥

25.
बुद्ध के पदचिह्नों पर जो चला,
वह स्वयं बोधिसत्व बना।
भीम का कर्म, करुणा बना,
हर युग में नवदीप बना॥

26.
गाँव के छोटे स्कूलों में,
जहाँ पहला पाठ पढ़ा जाता।
भीम वहीं अक्षर बन बैठा,
जहाँ मानव होना सिखाया जाता॥

27.
जो झुका नहीं, पर झुकाया नहीं,
वह था संवाद की संस्कृति।
भीम ने तोड़ा नहीं धर्म को,
बल्कि दी समता की युक्ति॥

28.
“हम भारत के लोग” — जो कहे,
भीम वहाँ हर हृदय में है।
संविधान की प्रथम ध्वनि में,
भीम अमिट हस्ताक्षर में है॥

29.
जो रच गया शब्दों में,
और बोलता है हर पीड़ा से।
वह भीम, जो आज भी चलता है,
हर वंचित की उम्मीद से॥

30.
भीम की गाथा शाश्वत है,
वह किसी कालखंड में सीमित नहीं।
जिस दिन अन्याय दिखे जहाँ,
भीम वहीं पुनर्जन्मित हो यहीं॥

31.
वह विचार नहीं, वह व्यवस्था है,
जो चेतना में प्रवाहित हो।
भीम का नाम उच्चारो मत,
उसे जीवन में परिवर्तित हो॥

32.
भीम के हर अनुच्छेद में,
मानवता की स्याही बहती।
वह संविधान नहीं केवल,
वह आत्मा की अभिव्यक्ति रहती॥

33.
“तू उठ, तू संघर्ष कर”,
भीम का यही उद्घोष रहा।
हर नींद को सपना देना,
उसका सच्चा प्रकाश रहा॥

34.
भाषा ना हो, पर विचार रहे,
भीम वहीं संवाद करेगा।
शब्द घटें या रूप बदलें,
वह चेतना में जागेगा॥

35.
मंच नहीं चाहिए उसे,
न पुरस्कार, न माला-फूल।
बस न्याय हो हर व्यक्ति को,
यही हो उसका असली मूल॥

36.
उसके जाने से क्या बदला,
बस स्वरुप हुआ वह मौन।
अब वह समय की आंख बना,
हर युग का संतुलन कोन॥

37.
दुनिया जिसे महापुरुष कहे,
भीम तो मानवता का धर्म।
ना केवल भारत का प्रहरी,
बल्कि समता का यशस्वी कर्म॥

38.
जिसने कहा “ना भाग्य मानो”,
वह विज्ञान का प्रवक्ता था।
भीम सिर्फ नीति नहीं,
वह विवेक का संकल्प था॥

39.
आज भी जब कोई बच्चा,
भेद-भाव से घायल होता।
भीम वहाँ प्रेरणा बनकर,
उसके भीतर दीप जलाता॥

40.
सत्य, शांति, करुणा, समता,
इन चार स्तंभों पर वह खड़ा।
भीम नहीं बस इतिहास में,
वह हर युग का जलता दिया॥

41.
भीम के होने का अर्थ यही,
कि तुम अन्याय को ना सहो।
जहाँ भी मनुष्यता हारे,
वहाँ साहस से तुम कहो॥

42.
“ना कोई ऊपर, ना नीचे”,
वह मूलमंत्र उसने दिया।
भीम ने नहीं धर्म हटाया,
धर्म में समता को जिया॥

43.
कोई ग्रंथ न पढ़ सका उसे,
जो भावना से रिक्त रहा।
भीम को समझने हेतु,
हृदय भी बुद्धिपूर्ण रहा॥

44.
मूल नहीं वह जाति का प्रश्न,
वह तो चेतना का विस्तार।
भीम का हर कथन बना,
नवयुग का उद्घोष अपार॥

45.
आज जब दुनिया धर्म से डरती,
भीम वहाँ सहिष्णुता बोता।
धम्म में वह प्रज्ञा भरता,
और अशांत मन को संजोता॥

46.
वह अतीत नहीं, वह भविष्य है,
जो समय को रचता चला।
भीम विचार नहीं, वह ध्वनि है,
जो नीरवता में भी चला॥

47.
जहाँ भी स्वतंत्रता अधूरी हो,
भीम वहाँ स्मृति बन जगे।
हर अधिकार की दीवार पर,
वह संकल्प बनकर लगे॥

48.
भीम की वाणी चुप नहीं है,
वह आज भी न्याय माँगती।
जिस दिन समता संपूर्ण हो,
वह आत्मा विश्राम पाती॥

49.
तो मत कहना — “भीम चले गए”,
क्योंकि वह हर दिन साथ खड़ा।
वह किताबों में नहीं बंद,
वह जीवन की माँग बड़ा॥

50.
अंत नहीं, यह प्रारंभ है,
भीम नित्य काल का संगीत।
जहाँ विवेक हो, जहाँ करुणा हो,
वहाँ गूँजता उसका गीत॥

खंड समापन श्लोक

नयन मुँदें तो अंत नहीं वह,
वह तो दृष्टि का स्रोत रहा।
भीम नहीं केवल जीवन मात्र,
वह चेतना का ज्योत रहा॥

बनारसी की वाणी (समापन संदेश – 10 पद)

(खंडकाव्य “भीम-दीप” के अंतिम हस्ताक्षर पद)

1.
ना मैंने दीप जलाए हैं,
ना शंखनाद किया भारी।
बस शब्दों की राख चुनकर,
भीम को गाया बनारसी।

2.
ना विद्वान, ना व्याकरणज्ञ,
ना कोई अलंकारधारी।
पीर को पदों में पिरोया,
बस बन गया मैं गाथाचारी।

3.
भीम की आँखों से देखा,
उनके स्वप्नों से निहारा।
जहाँ आँसू थे, वहाँ मैंने
समता का रंग उतारा।

4.
मैंने जात न पूछी शब्दों की,
न छंदों की कोई शुद्धता तानी।
बस पीड़ा जहाँ भी दिखी मुझे,
वहीं रच दी एक कहानी।

5.
बनारसी हूँ, ठाठ नहीं है,
ना कोई सिंहासन सपना।
पर एक कलम है काँप रही जो,
भीम की पीड़ा को है अपना।

6.
यह दीप जलाया मैंने यूँ ही,
ना पुरस्कार की कोई आस।
बस सोचा कोई एक भी पढ़ ले,
तो बुझती चेतना हो उजास।

7.
ना राजा ने पूछा हाल मेरा,
ना दरबारों में दी बारी।
पर उन वंचित आँखों से पूछो,
क्या कहता है बनारसी।

8.
कुछ कह नहीं सकता मैं भीम सा,
पर उनका अनुचर मान लिया।
अपने शब्दों के जर्जर रथ पर,
उनका ही यशगान लिया।

9.
कभी कागज़ भी गीला लगता,
कभी स्याही रोती जाती।
पर हिम्मत दी एक आवाज़ ने —
“भीम अब भी भीतर गाती।”

10.
अब न खंड बाँटूँगा और मैं,
न कोई छंद सजाऊँगा।
“भीम-दीप” में जो भी दिखा,
वो बनारसी ही कहलाऊँगा।

उपसंहार (संपूर्ण खंडकाव्य का निष्कर्ष)

“भीम-दीप” केवल एक काव्य नहीं — वह इतिहास की अग्निशिखा है, जो तमस में जन्म लेकर समता का सूर्योदय बन गई। यह खंडकाव्य डॉ. भीमराव अंबेडकर की उस यात्रा का काव्यमय संकलन है, जो शोषण की गहराइयों से निकलकर संविधान की उच्चतम शिखरों तक पहुँची।

यह कथा एक मानव की नहीं, बल्कि एक युग-चेतना की है — जहाँ एक बालक की भूख ने प्रश्न उठाए, और उन प्रश्नों ने पूरे समाज की नींव हिला दी।

यह खंडकाव्य:

उस शोषित बालक की कथा है, जो कुएँ से पानी न पी सका पर पूरी व्यवस्था को पी गया।

उस विद्यार्थी की कथा है, जिसने भीख में विद्या ली, पर बुद्धि की रोशनी से अंधकार का संहार किया।

उस क्रांतिकारी की कथा है, जिसने न तलवार उठाई, न आग लगाई — केवल विचारों से समता का संग्राम लड़ा।

उस शिल्पी की कथा है, जिसने कलम को संविधान बना दिया — जिसमें न कोई जात है, न रंग, न धर्म का परदा।

उस धम्म-दीक्षित प्रवक्ता की कथा है, जिसने बुद्ध के पथ पर चलते हुए लाखों को नई दृष्टि दी।

और अंततः, उस विचारक की कथा है, जो शरीर छोड़कर भी आज करोड़ों आत्माओं में जीवित है — प्रश्न बनकर, उत्तर बनकर, दीप बनकर।

“भीम-दीप” यह बताता है कि क्रांति केवल बंदूक से नहीं, बुद्धि, दया और दृढ़ता से होती है।
भीम का जीवन इस बात की गवाही है कि
👉 अगर पीड़ा है, तो परिवर्तन भी संभव है।
👉 अगर भेद है, तो समता भी आ सकती है।
👉 और अगर कोई अकेला है, तो वह संपूर्ण समाज को जगा सकता है।

इस खंडकाव्य का अंत नहीं है — क्योंकि भीम कोई चरित्र नहीं, एक चेतना हैं।
वे जब तक संविधान जीवित है,
जब तक कोई बच्चा स्कूल जाता है,
जब तक कोई मजदूर अपने अधिकार के लिए लड़ता है —
“भीम-दीप” जलता रहेगा।

और अंत में…

“जहाँ प्रश्न हैं, वहाँ भीम हैं।
जहाँ प्यास है, वहाँ दीप है।
और जहाँ समता की आशा है —
वहाँ ‘भीम-दीप’ अमर रहेगा।”

🙏🙏🙏🙏🙏🙏

– बनारसी :(जिसने केवल एक बात सीखी — भीम होना कठिन है, पर उसे गाना ज़रूरी है।)

©️ कॉपीराइट सूचना

खंडकाव्य: भीम-दीप
✍️ रचनाकार: सुनील बनारसी
📚 संग्रह: चाहत
सर्वाधिकार सुरक्षित © 2025

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✍️ लेखक की कलम से
(सुनील बनारसी द्वारा)

“भीम-दीप” केवल एक काव्य नहीं, मेरे अंतर्मन का दीप है।

जिस दिन भारत की मिट्टी ने भीमराव जैसा युगद्रष्टा जना —
14 अप्रैल —
उसी दिन 1985 में मेरे जीवन ने भी पहली साँस ली।

मुझे नहीं पता यह संयोग है या कोई अमूर्त प्रेरणा,
परंतु जब-जब मैंने कलम थामी,
भीम के पदचिह्नों से शब्द उगते गए।

उनकी पीड़ा मेरी स्याही बनी,
उनका स्वप्न मेरा संकल्प।

“भीम-दीप” लिखना मेरे लिए जन्मदिन को अर्थ देना था —
एक ऐसा अर्थ, जो समाज की समता और करुणा से जुड़ा है।
यदि इस दीप की रोशनी
किसी एक मन को भी अंधकार से बाहर निकाल सके —
तो यही मेरे जन्म का सौभाग्य है।

— सुनील बनारसी
(जन्मतिथि: 14 अप्रैल 1985)
लेखक, शिक्षक, संवेदनशील समाजकर्मी

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