संविधान तो बन गया, पर आज़ादी कहाँ मिली?
संविधान तो बन गया, पर आज़ादी कहाँ मिली?
हर मोड़ पर समझौता है, हर राह पर कोई झुका मिला।
काग़ज़ों में अधिकार लिखे, पर दिलों में डर अभी भी है,
सच बोलने की कीमत आज भी एक ज़िंदा जंजीर सी है।
जिसे देखो, हालातों की मजबूरियों में घिरा नजर आता है,
मानो इंसान नहीं, किसी भारी तराज़ू का बोझ उठाता जाता है।
आज़ादी का अर्थ शायद अब किताबों में कैद हो गया,
ज़िंदगी के हक़ीक़त वाले पन्नों में तो सब कुछ सहेज हो गया।
फिर भी उम्मीद की लौ बुझने न देना,
किसी दिन यही मिट्टी सच्ची आज़ादी के फूल जरूर देगी ।
स्वरचित,
रजनी उपाध्याय 🙏🙏