शांतिनिकेतन में एक दिन
यूं तो
कई दिनों के तरह
इस दिन को भी
बीत जाना चाहिए था ,
बिना कोई विशेष हुए…
पर यह मिट्टी, यह हवा, यह छाँव
कविगुरु के इस निकेतन में
आने भर से ही
हर श्वास विशेष होने लगी।
भीतर पीएचडी का साक्षात्कार
विचारों की तीक्ष्ण धार।
बाहर संगमन में श्रेष्ठ जनों के
गहन, शांत विचार और
गुरु जनों का मीठा-सा सान्निध्य।
रात की चादर ओढ़ी
नीचूबंग्लो हॉस्टल की दीवारों ने,
जहाँ गूँजती रही
लड़कों की उन्मुक्त हुड़दंगी,
और लिपटा था
अनुजों का निःस्वार्थ, कच्चा प्यार।
बाज़ार की पगडंडी पर
वो छेना मिठाई की
हल्की-सी मिठास,
और
सर्द होती शाम में
हाथों को सेंकती
गर्मागर्म चाय की भाप।
सब कुछ मिला।
ज्ञान… सान्निध्य… शोर…
और सुकून।
हाँ, सब कुछ
मेरे जीवन के खाते में
बैठा यह एक
अनोखा संयोग।
© अमन कुमार होली