घर होता है खुशियों का पूर
घर होता है खुशियों का पूर।
छोटा हो या बड़ा हो,
झोपड़ी हो या महल हो,
होता है यादों का पूर।
आ गया हूँ घर से दूर।
छोड़कर खुशियों का पूर।
करता हूँ घर को याद।
चल रहा है मन में विषाद।
करता हूँ जब घर को याद,
आ जाती है माँ – बाप की याद।
जाता था देखने मेला, माँ – बाप के संग।
आ जाते थे भाई – बहन भी हमारे संग।
लाते थे मेले से, हम सब खिलौने ।
खेलतें थे आंगन में हम सब खिलौनें।
करता हूँ जब याद घर को,
करता है मन जाने घर को।
चलाने घर की अजीविका को,
आ गया हूँ घर से दूर।
छोड़कर खुशियों का पूर।
आतीं है याद ,
माँ के हाथों से बने भोजन की।
पिता की डांट फटकार और स्नेह की।
घर में बिताऐं उन हसीन पलों की,
बन गई है जो वेदना मेरी,
घर से दूर रहनें की।
माँ देश में, पिता देश में, घर भी देश में,
फिर मैं क्यों रहूँ इस परदेस में?
जा रहा अपने देश को।
मिलने माँ – बाप को।
पाने खुशियों के पूर को।
छोड़कर परदेस को।
रहूंगा अपने देश में।
माँ – बाप के साथ में।
यादों के घर में,
खुशियों के पूर में।
शिवम विश्वकर्मा
यह कविता मेरी घर से दूर रहने की कल्पनाओं पर आधारित है। यह कविता मेरे द्वारा 16 वर्ष की आयु में लिखीं गई हैं।