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26 Nov 2025 · 1 min read

सर्दियों की सर्द हवाएं

सर्दियों की ये सर्द हवाएँ, किस्मत की फुसफुसाहट है
मन के सूने जंगल भीतर,दर्द की नाजुक आहट है।

धूप कहीं कंबल में छिपकर,धीमी साँसें लेती बैठी
जैसे जीवन की अंतिम लौ, बुझने को कांपती रहती।

ओस की बूँदें पत्तों पर, यादों जैसी जम जाती हैं,
रातों में चुपचाप पिघलकर, आँखों में मुस्काती हैं।

अंगीठी में राख बची है,कुछ स्वप्नों की बुझी कहानी,
जो चिंगारी भी ना उठे, तो फिर लौटे गहरी वीरानी।

हवा की ठंडी थाप में छिप,भाग्य कहीं मुस्काता होगा,
सूने दरवाज़ों के पीछे, अपने सितम गिनाता होगा।

छत पर पड़े हुए पत्ते,हिलते हैं, उड़ नहीं पाते,
जैसे हम भी कुछ रिश्तों के, जाल से बाहर न आ पाते।

दूर-दूर तक फैली ठंडक,मन की थकन सुना जाती,
जैसे कोई पुरानी पीड़ा,धीमे धीमे सिसकती गाती।

कभी हवा अनसुनी होकर,भीतर तक चुभ जाती है,
जैसे कुछ कड़वी बातें,बर्फ सी जम जाती हैं

अंत में केवल शून्य शेष है,हिमश्वेत,रात-सा भारी,
सर्द हवा की लंबी साँसें,कहतीं जीवन की दुश्वारी

सर्दियों की ये सर्द हवाएँ,लौट-लौट कर समझाती हैं
स्नेह की गर्माहट मखमली,नवजीवन दे जाती हैं।

(स्वरचित मौलिक)

-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

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