राखी की डोर
राखी का, है पर्व महान
प्रेम बहन का भाई का अभिमान
दुआओं की थाली में प्रेम की मिठास
भाई-बहन का रिश्ता,है खास
श्रावण माह की पूर्णिमा है आई
राखी से सजी है भाई की कलाई।
उजले माथे पर रोली का टीका
चमके जैसे सूरज नील गगन का।
पुलिकन मन औ खुशियां है अपार
रिमझिम करें जैसे सावन की फुहार।
हजारों वचन लिए है,इक धागा
बिना बहन के भाई हैं अभागा
महकता हुआ यह प्रेम चमन है
रक्षा का ये भाव गहन है।
बैरी भी जब-जब हाथ बढ़ाया
राखी बांध अपनत्व निभाया।
जब-जब आई रिश्ते में दरार
राखी के धागों ने भरा,उसे हर-बार।
सनातन-परम्परा की माटी में पलकर
‘खुशबू’ संस्कृति की फैलती हर घर पर।।
✍✍ डॉ.नीलम सरोज’खुशबू’