जाने कौन सजाता है घर में रंगोली बाबूजी
जाने कौन सजाता है घर में रंगोली बाबूजी
जाने कौन मँगाता होगा चनिया-चोली बाबूजी
अब तो शायद वक्त से पहले ही ऑफिस जाते होंगे
अब तो कौन छुपाता होगा चश्मा-झोली बाबू जी
अब तो मैं चिड़ियों के जगने से पहले ही जग जाती हूं
अब तो करना भूल गई मैं कोई ठिठोली बाबूजी
सोच रही थी जब जाऊँगीं तो धरती हिल जाएगी
देख रही हूं एक शजर की शाख न डोली बाबूजी
सुबह-सुबह ही तकिए से अपना मुह ढक कर बैठी हूँ
सुबह-सवेरे तुमने भी तो आँख भिगो ली बाबू जी
हँसता गाता बचपन मेरा बिल्कुल सपने जैसा था
सपना लेकिन टूट गया जब आँखें खोली बाबूजी
लगता है मुझको बीते दिन फिर से वापस आएंगें
लगता है की वक़्त ने खेली आँख मिचोली बाबूजी