आओ भड़ास निकालें
व्यंग्य
आओ भड़ास निकालें
भर भर आए आस। यानी भड़ास। आप भी भड़ास निकालते हैं। हम भी निकालते हैं। भड़ास स्त्रीलिंग है। पुल्लिंग नहीं। भड़ास का हिंदी में अर्थ गुस्सा, असंतोष, गुबार है। अंग्रेजी में इसको वेंट कहते हैं। तालमेल हो न हो। मान लीजिए। मानने में क्या रखा है? गणित के कई फार्मूले “मानने” से ही हल होते हैं।
भड़ास समय की मांग है। जितनी मांग उतनी आपूर्ति। यह फार्मूला यहां लागू नहीं होता। भड़ास अनंत है। व्यापक है। किसी को कार्यक्रम में नहीं बुलाया। शादी में इनवाइट नहीं किया। तो वो भड़ास निकालता है। बुला लो, तो भड़ास निकालता है। मंच पर बैठाओ तो भड़ास। न बैठाओ तो भड़ास।
भड़ास मेघों की घटा है। कुछ कहेंगे क्या उपमा है? वाह। कुछ कहेंगे, यह कौन सा शब्द है। मेघ भी घटा भी। बस, इसी फार्मूले से भड़ास निकलती है।
उदाहरण से समझिए। आपने चावल उबलने के लिए रखे। चावल उबलते रहे। उबलते रहे। फिर एक सफेद परत आ गई। यह किसी काम की नहीं। आपने उसे चम्मच से अलग कर दिया। यह चावल की भड़ास है। आपने उसे अलग किया, यह आपकी कला यानि भड़ास है।
आप दांत साफ करते हैं। पेस्ट आपकी इच्छा के मुताबिक नहीं निकलता। कभी कम, कभी ज्यादा। दांतों को भड़ास का पेस्ट चाहिए। जितना भी निकले। दांतों की चमक भड़ास से है।
और सुनिए। आपने किसी की पोस्ट पढ़ी। “अरे यह क्या लिख दिया?”आपके दिल में ज्वार उठेगा। अंदर अंदर। आप कसमसाएंगे। इधर से उधर घूमेंगे। भड़ास आपको परेशान करेगी। मरोड़ उठेगा। पेट में अफ्फारा होगा। जैसे ही भड़ास निकली। पेट साफ। सुकून। जंग जीती।
भड़ास कभी भी,कहीं भी, किसी भी हाल में निकल सकती है। गद्य हो या पद्य। भड़ास का अपना उद्योग है। इसकी नेटवर्थ ज्यादा है। पत्नी पति पर भड़ास निकालती है। पति पत्नी पर। “कहां जा रहे हो? कब तक आओगे? ” यह भड़ास के ही सांस्कृतिक शब्द हैं। यह नहीं किया, वो नहीं किया, क्यों नहीं किया। यह आलंकारिक शब्द हैं।
हमारे नेता प्रतिदिन भड़ास निकालते हैं। हम चाव से देखते सुनते और अमल में लाते हैं। नेता हवा में सिक्का उछालते हैं। हम लपकते हैं। फिर उसकी मीमांसा करते हैं। परस्पर लड़ते हैं। भड़ास निकालते हैं। मुद्दे ने अपना काम कर दिया। भड़ास आगे। मुद्दा पीछे।
भड़ास न हो तो? न सोशल मीडिया चले। न आप? सक्सेना जी बता रहे थे..”बहुत दिनों से भड़ास नहीं निकली। लिखता हूं तो भड़ास निकल जाती है। ” शर्मा जी भी परेशान थे। वह सबकी वॉल पर जाते। देखते, कुछ मिल जाए। भड़ास का आइटम नहीं मिला। भड़ास यहीं कुंठित हो जाती है।
भड़ास उमड़ती है। भड़ास घुमड़ती है। भड़ास जला देती है। भड़ास मिला देती है। यह मन का असंतोष है। नहीं,नहीं। संतोष है। भड़ास उद्वेग है। यही तो हमारा वेग है। भड़ास वेदना है। समय की चेतना है। भड़ास नशा है। इसी में मज़ा है। भड़ास तूफान है। अपना यही मचान है।
भड़ास निकालते रहोगे। चैन से रहोगे। चलते रहोगे। चले गए तो पछताओगे.. “वो भड़ास नहीं निकाल पाए”।
वैसे अब मरने पर भी भड़ास निकलती है। लेकिन यह वन साइड टारगेट है। वो भड़ास निकालता रहता है। आप क्या करोगे? भड़ास रह गई। ऑप्शन बंद। इसलिए, जब तक सांस है, भड़ास निकालते रहो। हर सांस में एक भड़ास। खुश रहोगे..प्यारे मोहन।
सूर्यकांत
26.11.2025