जब तिरस्कार ही बने ताकत तेरी....
जब करता है कोई आलोचना तेरी,
व्यवहार में न लाना असहजता कोई।
तुम संयम रख सुनते जाना,
एक-एक कर गुनते जाना।
जब करे कोई कटु व्यवहार,
हर पल करे तेरा तिरस्कार,
धैर्य न स्वयं का खोने देना,
सब कुछ खुद में होने देना।
जब करने लगे सब तुम पर कटाक्ष,
मिलकर करें तेरा परिहास,
तब मौन-व्रत रख लेना तुम,
दृढ़ता से टिक कर रहना तुम।
हो ना, हैरान हो मेरी बातों से?
अरे ! बल मिलेगा तुम्हे सबकी नफ़रत से।
कोई जितना करे तुम्हारा बहिष्कार,
तुम उतना ही स्वयं में करना विस्तार।
तुम रखोगे खुद को जितना शांत,
हर पल रहेंगे तेरे दुश्मन अशांत।
जो कर्म-पथ पर रहते लीन,
उनको रहता खुद पर यक़ीन।
धूमिल न होती कभी उनकी मुस्कान,
जो अपने दम पर बनाते अपनी पहचान।
यह नियति है—सब खींचेंगे,
तुम्हारे आत्मबल को न सींचेंगे।
धकेलेंगे तुम्हें ऐसे दलदल में,
कि तुम निकल न सको अपने बल से।
वे जितनी ताकत से गिराएंगे,
तुम उतने ही निखरते जाओगे ।
अंत में हार उन्हें ही खानी है,
तुम्हें तो अपनी जीत की कहानी सुनानी है।