कविता:'स्पंदन'
अनबन भी मधुर बंधन है,
संबंधों का यह स्पंदन है।
चेहरों पर खिले उजियारे,
हर पल जीवन का दर्पण है।
आंखों में प्रश्न नहीं सपने,
उत्तर बनता हर क्षण-क्षण है।
मुस्कान बाँटता जो हरदम,
वह सच्चा सबसे धनवन है।
अपने भीतर उपवन क्या है?
सारा जग ही तो अपना बन है।
सुनील बनारसी