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26 Nov 2025 · 1 min read

कविता:'स्पंदन'

अनबन भी मधुर बंधन है,
संबंधों का यह स्पंदन है।

चेहरों पर खिले उजियारे,
हर पल जीवन का दर्पण है।

आंखों में प्रश्न नहीं सपने,
उत्तर बनता हर क्षण-क्षण है।

मुस्कान बाँटता जो हरदम,
वह सच्चा सबसे धनवन है।

अपने भीतर उपवन क्या है?
सारा जग ही तो अपना बन है।

सुनील बनारसी

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