धर्मेन्द्र
एक नायक का जाना।
एक मनभावन चेहरा खो जाना।
मस्त रहना सिखाया उसने।
हर भूमिका को दिल से निभाया उसने।
कभी सत्यकाम बन ईमानदारी सिखाई।
कभी चुपके चुपके से हंसी बंधाई।
वीरू बन उसने दोस्ती निभाई।
कभी समाधि से त्याग की परिभाषा सिखलाई।
प्रतिज्ञा से यमला पगला कर दीवाना बनाया।
लोफर से इश्क करने का अफसाना सिखाया।
जिस रूमानियत से इश्क किया
उस भावना ने सबको जीत लिया।
आज चला गया सबको रोता छोड़कर।
उसको परम शांति मिले प्रार्थना है हाथ जोड़कर।