वो जो कौल से ही मुकर गया
वो जो कौल से ही मुकर गया
वो मिरी नज़र से उतर गया
वो जो लम्हा मुझको अज़ीज़ था
वो तो सदियों पहले गुज़र गया
जिसे ढूढ़ती है मिरी नज़र
वो नज़र की हद से गुज़र गया
जिसे कश्तियों ने दगा दिया
वो ही पहले पार उतर गया
हुई शेख ओ रिन्द की निस्बतें
ये बिगड़ गया वो सुधर गया
यूं ही ठंडी ठंडी हवा चली
यूं ही मेरा दर्द उभर गया
मुझे कल की बात का रंज है
कोई था नशा जो उतर गया
11212 11212
मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन