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25 Nov 2025 · 1 min read

वो जो कौल से ही मुकर गया

वो जो कौल से ही मुकर गया
वो मिरी नज़र से उतर गया

वो जो लम्हा मुझको अज़ीज़ था
वो तो सदियों पहले गुज़र गया

जिसे ढूढ़ती है मिरी नज़र
वो नज़र की हद से गुज़र गया

जिसे कश्तियों ने दगा दिया
वो ही पहले पार उतर गया

हुई शेख ओ रिन्द की निस्बतें
ये बिगड़ गया वो सुधर गया

यूं ही ठंडी ठंडी हवा चली
यूं ही मेरा दर्द उभर गया

मुझे कल की बात का रंज है
कोई था नशा जो उतर गया
11212 11212
मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन

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