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24 Nov 2025 · 1 min read

ग़ज़ल 221 2121 1221 212

ग़ज़ल 221 2121 1221 212

अपनों को ख़ूब प्यार जताने से क्या मिला,
ग़ैरों से रोज़ लड़ने लड़ाने से क्या मिला।

मेरा भरोसा तोड़ने वाले कहाँ न थे,
विश्वास की पतंग उड़ाने से क्या मिला।

मंझधार पे सफ़ीना मेरा रोज़ सोता है,,
साहिल पे आशियाना बनाने से क्या मिला।

बेटे झगड़ रहे मेरे पैसों को बांटने,
ताउम्र इतना पैसा कमाने से क्या मिला।

यादों की गठरी लग रही भारी उठाने में,
सोचता हूँ उसको भुलाने से क्या मिला।

वो मेरे सर पे हाथ रखी जाते वक़्त भी,
ता उम्र अपनी माँ को सताने से क्या मिला।

दुनिया में दर्दो ग़म ही अधिक बिखरें हैं तो फिर ,
दानी बताओ दुनिया में आने से क्या मिला ।

( डॉ संजय दानी दुर्ग सर्वाधिकार सुरक्षित )

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