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23 Nov 2025 · 1 min read

बेलन की मार (एक हास्य ग़ज़ल)

एक से दो हुए, दो से हैं चार अब
भूलकर भी करूँगा नहीं प्यार अब

चौका-बर्तन किया, खाली बैठा हूँ मैं
दे दो साड़ी भी करना न इनकार अब

अब तो आजाद कर दो मुझे ऐ सनम
हार पहनाया लेकिन गया हार अब

जो गले तू लगी, क्यों गले पड़ गयी
पड़ गया है गले जैसे *आधार अब

इसलिए ही सम्हलकर मैं रहता सदा
एक माचिस की तीली है अंगार अब

जो कहोगी करूँगा, डरूँगा नहीं
तेरा मुझको डराना है बेकार अब

इतना गुस्सा दिखाना मुनासिब नहीं
हुस्न दिखने लगा कितना खूंखार अब

तुमको लिख के दिखाया, ग़लत क्या किया
जो ये बेलन की पड़ने लगी मार अब

जिसको ‘आकाश’ रेशम की डोरी कहा
बिजली का बन गई है वहीं तार अब

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 20/11/2025
__________________
*आधार = आधार कार्ड

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