अजी आइने भी , सँवरने लगे हैं
गज़ल ,,,,
अजी आइने भी , सँवरने लगे हैं ,
मुक़द्दर भी इनके , निखरने लगे हैं ।
नज़ारे दिखाए , गये आशिक़ों को,
वहीं बिन पिए सब , बहकने लगे हैं ।
भुला बैठे चाहत में , सारा ज़माना,
वफ़ा की लहर पर , मचलने लगे हैं ।
गुलाबों ने पूछा , मुझे पास आकर ,
दिलों में ही क्यूं बस, धड़कने लगे हैं ।
गुज़ारा न कर पाये , अपनो से ही वो,
नज़र में सभी की , उतरने लगे हैं ।
न बोले न शिकवा , ख़ता क्या हुई थी ,
मुहब्बत में साहब , खिसकने लगे हैं।
परिंदों की चाहत , गज़ब देख ली थी,
मिली ‘नील’ जब से ,चहकने लगे हैं ।
नीलोफर ख़ान नील रूहानी