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23 Nov 2025 · 1 min read

अजी आइने भी , सँवरने लगे हैं

गज़ल ,,,,

अजी आइने भी , सँवरने लगे हैं ,
मुक़द्दर भी इनके , निखरने लगे हैं ।

नज़ारे दिखाए , गये आशिक़ों को,
वहीं बिन पिए सब , बहकने लगे हैं ।

भुला बैठे चाहत में , सारा ज़माना,
वफ़ा की लहर पर , मचलने लगे हैं ।

गुलाबों ने पूछा , मुझे पास आकर ,
दिलों में ही क्यूं बस, धड़कने लगे हैं ।

गुज़ारा न कर पाये , अपनो से ही वो,
नज़र में सभी की , उतरने लगे हैं ।

न बोले न शिकवा , ख़ता क्या हुई थी ,
मुहब्बत में साहब , खिसकने लगे हैं।

परिंदों की चाहत , गज़ब देख ली थी,
मिली ‘नील’ जब से ,चहकने लगे हैं ।

नीलोफर ख़ान नील रूहानी

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