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23 Nov 2025 · 3 min read

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा
पुस्तक का नाम: छाया धुंध का राज गगन में
कवयित्री: डॉक्टर रीता सिंह
सी- 27, आशियाना 1, कॉंठ रोड, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
(असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, एनकेबीएमजी पीजी कॉलेज, चंदौसी,सम्भल
मोबाइल 827 977 484 2 तथा 97597 4 8673
प्रकाशक: साहित्यपीडिया पब्लिशिंग, नोएडा, भारत 201301
फोन 91- 9618066119
प्रथम संस्करण: 2025
पृष्ठ संख्या: 102
मूल्य: ₹200
समीक्षक: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451
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भारत की प्रकृति से प्रेम की कविताऍं
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“छाया धुंध का राज गगन में” काव्य संग्रह मेरे समक्ष है। कवयित्री डॉक्टर रीता सिंह ने इसमें भारत की प्रकृति से प्रेम की कविताएं लिखी हैं अर्थात प्रकृति से प्रेम तो है लेकिन वह भारत की प्रकृति से प्रेम की विशिष्टता लिए हुए है। भारत की एक विशिष्ट प्रकृति है जो यहां के पेड़, पर्वत और नदियों से ही नहीं यहां के परंपरागत कैलेंडर और उसके प्राचीन महीनों के नाम से भी प्रकट होती है। दोहे कवयित्री डॉक्टर रीता सिंह को विशेष प्रिय हैं। काव्य की इस विधा पर उनका अच्छा अधिकार है।

‘मॉं गंगा’ शीर्षक से इसीलिए उन्होंने दोहे लिखे हैं। दोहों के माध्यम से ही चैत्र-वैशाख से लेकर फागुन तक बारह महीनों की श्रृंखला में से प्रत्येक माह पर सात-सात दोहे आपने लिखे हैं। इन दोहों में हर महीने की विशिष्टता बताई गई है। खास बात यह है कि आजादी के बाद से विक्रम संवत उपेक्षित रहने के बाद भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। जन भावनाओं को जो भीतर बहुत गहरे आज भी जीवित हैं, कवयित्री ने मुखरित किया है। बहुत मन से यह कविताएं लिखी गई है। इनमें हम ‘दावानल’ शीर्षक से जंगल की चीख सुनते हैं। गौरैया का फुदकना देखते हैं। कंकड़ पत्थर के जंगलों में एक कविता ‘तरुवर छॉंव कहॉं से लाऊॅं’ शीर्षक से आमजन की आवाज है।

पुस्तक का नामकरण जिस कविता के आधार पर हुआ है उसकी चार पंक्तियां इस प्रकार हैं:-

गाड़ी एसी अब घर-घर में
इनके बिना न शान शहर में
रूप यही भौतिक विकास का
खुश हैं हम दो घूॅंट जहर में

वृक्षों के बारे में जहां आमतौर पर कवयित्री ने कविताएं लिखी हैं, वही अमलतास और गुलमोहर पर अलग से कविताएं लिखी हैं। गुलमोहर को तो कवयित्री ने ‘शहजादे’ कह कर पुकारा है। सचमुच इसका रूप सौंदर्य ऐसा ही है ।

प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण करते हुए भी कवयित्री ने दीन दुखी जन की पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया है। इसीलिए तो वह लिख पाई है:-

कपड़ों से कब सर्दी भागी/ जले ॲंगीठी और अलाव/ दीन दुखी से बेबस जन को/ सर्दी दिखा रही है ताव (पृष्ठ 45)

मन की गहराइयों से जब परिवेश में अपनेपन को ढूंढा जाता है और हृदय से लगा लिया जाता है, तभी ऐसी मार्मिक कविताएं आकार ले पाती हैं।
गीत और गजल के साथ-साथ हाइकु भी इस कविता संग्रह में हैं।

विक्रम संवत के महीनों के आधार पर कुछ दोहे पुस्तक से उद्धृत करना अच्छा रहेगा। पाठक कवयित्री के काव्य कौशल को सराहे बिना नहीं रहेंगे।:-

नव संवत है आ रहा, कहे चैत्र शुभ मास। ऋतु बसंत है जा रही, गर्मी आई पास।।

गर्म बड़ा ही जेठ है, करता सब पर क्रोध। डरें सभी उस रूप से, कैसे करें विरोध।।

उमस करे बेचैन है, धरें सभी जन धीर। आस लगी आषाढ़ से, बरसेगा अब नीर।।

घिरी घटा घनघोर है, हुए मेघ घनश्याम। बेला प्रातः काल की, अब भादो के नाम।।

गिरता पारा कॉंपती, पौष मास की रात। पाले कुहरे से ढका, ठिठुरा धरती-गात।।

कुल मिलाकर कवयित्री डॉक्टर रीता सिंह का काव्य संग्रह रुचिकर है। इसे पढ़ने में हम प्रकृति और संस्कृति दोनों का दर्शन करते हैं।

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