#लघुकथा...
#लघुकथा…
✍️ चतुराई की मिसाल।
(प्रणय प्रभात)
पता नहीं क्या सोच कर “भोंदू लाल” नाम रखा होगा मां बाप ने। शायद पता नहीं होगा कि बड़ा होकर अच्छे अच्छों को भोंदू बना देगा उनका शातिर सपूत। बूढ़े मां बाप को नामकरण में हुई चूक कभी पता नहीं चलती, यदि उन्होंने बेटे और बहू का संवाद न सुना होता। सुना तब लगा कि नाम भोंदू लाल की जगह चतुर प्रसाद रखा जाना था उसका। नाम से ठीक उलट सोच जो थी उसकी। बिना दमड़ी खर्चे दूसरे की चमड़ी उतार लेने का हुनर भी। यही तो समझ आया उन्हें, रात की बात से।
दरअसल, अगले महीने देव उठान के दिन ब्याह था पोती का। पोती मतलब भोंदू लाल की इकलौती बेटी का। इसी की पूर्व तैयारियों को लेकर कर रहा था अपनी धर्मपत्नी से चर्चा। मामला उत्साह का था, तो आवाज़ भी आम दिनों से ऊंची थी। तभी तो सुन पा रहे थे उसके बूढ़े माता पिता। रात के सन्नाटे में मनोयोग से कान लगा कर। दादा दादी होने के नाते उमंग उनकी भी कुछ कम नहीं थी बेटा बहू से। यह बात अलग थी कि उनकी राय न अपने कुलदीपक भोंदू को चाहिए थी, न दूसरे कुल से आई बहुरानी को।
दोनों के बीच चल रही बातचीत का मुद्दा बड़ा सहालग था। तमाम शादी ब्याह एक दिन में होने से कामगार मिलने मुश्किल थे। मिल भी जाएं तो दिहाड़ी अधिक हो जाने की आशंका थी। पैसा अपार था पर एक चवन्नी भी दांत से दबा कर रखने की थी। इसी मसले को लेकर भोंदू लाल को ताने दे रही थी उसकी बीवी गोमती। गाय की मति पर आधारित नाम के विपरीत लोमड़ी जैसी अक्ल वाली औरत। भोंदू लाल को उलाहना इस बात पर दे रही थी कि उसने नौरते के बाद ही भाड़े के लोग तय क्यों नहीं किए। बेमतलब में अब डेढ़ से दो गुना भाड़ा और दिहाड़ी देनी पड़ी तो।
पत्नी के इसी ताने पर अपनी सफाई दे रहा था भोंदू लाल। धूर्तता से भरपूर लहजे में शातिराना तरीके से। वो जैसे जैसे अपने मंसूबों के पन्ने खोल रहा था, गोमती की आँखें फटी जा रही थीं। दुनिया भर का ज्ञान पाकर भी उम्र भर मूर्ख रहे मां बाप के कान भी खड़े होते जा रहे थे। पता लग रहा था कि तीन बार दीवाला घोषित कर बचाए गए लाखों चंद साल में करोड़ों कैसे हुए। ग़लत नाम रखने पर खेद से कई गुना ज़्यादा फ़ख्र हो रहा था उन्हें भी आज अपने लाल पर। बिना हर्र फिटकरी के चोखा रंग लाने का फार्मूला जो बता रहा था उनका भोंदू नामक स्याना सपूत।
भोंदू लाल कह रहा था कि कस्बे में आधा सैकड़ा से ज़्यादा समाजसेवी हैं। सारे के सारे थोथी वाहवाही के लालच में सारा दिन बेगार करने के आदी। वो उन्हें इस ब्याह में दो दिन का न्यौता देकर बुला रहा है। कन्या के विवाह को पुण्य कार्य व सेवा का अवसर बता कर। दो दिन चार वक़्त का भोजन करेंगे और सारा काम चार दिन के चाचा ताऊ के तौर पर पूरी दमखम से संभाल लेंगे। दिन भर की उठाई धराई से लेकर सामानों की सार संभाल तक। परोसगारी से पत्तल उठाने तक।
इसी तरह दौड़ धूप से सामान ढोने तक में काम आएंगे मोहल्ले के दर्जन भर मुस्टंडे। जो कल तक उसकी लाडो की एक झलक पाने को मरे जा रहे थे। एक दिन का न्यौता तो देना ही था, दो दिन का सही। भोंदू लाल के जीवन में बला बन कर आई गोमती इन बातों को सुन सुन कर उसकी बलाएं लेने पर मजबूर थी। वहीं भोंदू था कि अपनी होशियारी की नुमाइश में कोई कसर छोड़ने को राज़ी नहीं था। पैसे बचाने और जेब में दोनों हाथ डाल कर घूमने की पूरी प्लानिंग जो किए बैठा था छोटी सी खोपड़ी में। पलंग के पायताने बैठी गोमती सिरहाने से टिके अपने पति पर बलिहार हुए जा रही थीं। पिछवाड़े के कमरे में अपनी अपनी खटिया पर पड़े मां बाप भी अघा नहीं रहे थे अपने भोंदू की चतुराई पर। वहीं भोंदू लाल की आंखों में तैर रही थी साल भर पहले संपन्न पड़ोसी की बेटी की शादी। जो कुछ संवेदनशील, सेवाभावी व समर्पित लोगों की मदद से निर्विघ्न संपन्न होकर चर्चा का विषय बनी थी। उसे शायद यह पता नहीं था कि उस शादी में बढ़ चढ़ कर सहयोग करने वाले उसकी तरह चालबाजी से नहीं, मान मनुहार से आमंत्रित किए गए थे। आत्मीय व्यवहार व पारिवारिक संबंध के आधार पर। वो भी समुचित मान सम्मान के भाव और चिर कृतज्ञता के संकल्प के साथ। वो भी शारीरिक नि:शक्तता की विवशता के कारण। जिसे अब भोंदू लाल एक फोकट के फार्मूले की तरह अपनाने और आज़माने को बेताब था। काश उसके मंसूबों की समझ उसके चाल, चेहरे व चरित्र को बरसों से जानने के बाद भी मोहरा बनने वालों को होती।।
संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मध्यप्रदेश)