'संगम'
‘संगम’
जटा-जूट में लिपटा तपो तेज,
भस्म-विभूषित मुखमण्डल भेष।
गम्भीर नयनों में सागर गहन,
मौन कथा कहते अनादि चरण।
इशारा करती उस चित्रपथ पर,
जहाँ समाधि का अनन्त स्वर।
एक ओर युग का नूतन विचार,
दूजी ओर सनातन आधार।
संगम यह जीवन का उपहार,
बनारसी—”खोजो आत्मसार।”
सुनील बनारसी