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23 Nov 2025 · 1 min read

​ 'संगम'

​ ‘संगम’
​जटा-जूट में लिपटा तपो तेज,

भस्म-विभूषित मुखमण्डल भेष।

गम्भीर नयनों में सागर गहन,

मौन कथा कहते अनादि चरण।

इशारा करती उस चित्रपथ पर,

जहाँ समाधि का अनन्त स्वर।

​एक ओर युग का नूतन विचार,

दूजी ओर सनातन आधार।

संगम यह जीवन का उपहार,

बनारसी—”खोजो आत्मसार।”

​सुनील बनारसी

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