निशा पलायित हो गई, आया पावन भोर।
निशा पलायित हो गई, आया पावन भोर।
स्वागत में अब सूर्य का, चिड़िया करती शोर।।
कलिया पुलकित हो उठी, सोये सभी चकोर।
हलचल उपवन में हुआ, हर्षित है वन मोर।।
दिनकर कहने आ गयें, बढ़ो लक्ष्य की ओर।
राह प्रतीक्षा कर रही, बनो नहीं श्रम चोर।।
प्रातः बेला देखकर, निश्चय करें कठोर।
लक्ष्य भेदना है हमें, सारी शक्ति बटोर।।
सप्त रश्मियों ने हमें, रख दी है झकझोर।
“पाठक” बैठे क्यों भला, अपना दाँत निपोर।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)