गजल: 'दिल की लाचारी'
दिल की लाचारी
सुनील बनारसी
दिल को जो समझा बैठे,
वही खुद शिकारी हो तो”
जिसको दुनिया माने सच्चा
वो सच में गुनहगारी हो तो
तेरी जानिब क्यों आ जाऊँ
फिर भी याद तुम्हारी हो तो
जिसे तुम ख़ुद्दारी कहते,
वही ज़िद बेकरारी हो तो”
अपने हाल को रोने वाले
वो खुद अपनी लाचारी हो तो
बाहर आँसू कम दिखते हों
दिल में रौशनी सारी हो तो
इज़्ज़त सबकी करनी होगी
दुश्मन भी दरबारी हो तो
सुनील बनारसी