सुख-दुःख — एक ही तरंग के दो रंग
सुख-दुःख — एक ही तरंग के दो रंग
✍️ सुनील बनारसी
जीवन के बड़े अद्भुत नियम हैं। सुख और दुःख देखने में दो विपरीत अनुभव लगते हैं, परंतु वस्तुतः वे एक ही ऊर्जा की दो भिन्न दिशाएँ हैं। वही उत्तेजना, वही मनोविकार — यदि हमें प्रिय लगें तो सुख बन जाते हैं, और यदि अप्रिय लगें तो दुःख। फर्क बस इतना है कि हमारी पसंद और नापसंद का कोण बदल जाता है, बाकी अनुभूति का स्वरूप वही रहता है। यह समझ लेना ही जीवन के गूढ़ रहस्य को जान लेने जैसा है।
जीवन एक झील की तरह है, जिसमें समय की हवा बहती रहती है। यह हवा जब सतह को छूती है तो तरंगें उठती हैं — कभी धीमी, कभी तीव्र। कुछ तरंगें हमें मधुर लगती हैं, कुछ बेचैन करती हैं, परंतु जल वही है, झील वही है। यही बात सुख और दुःख पर लागू होती है। दोनों एक ही मन की लहरें हैं, जो समय के साथ उठती-गिरती रहती हैं। जब कोई घटना हमारे मनोनुकूल होती है तो हम उसे सुख कहते हैं, और जब वही घटना हमारे विपरीत लगती है तो हम उसे दुःख कह देते हैं। अंतर घटना में नहीं, बल्कि हमारे दृष्टिकोण में होता है।
एक विद्यार्थी को परीक्षा में उच्च अंक मिलते हैं तो वह प्रसन्न होता है, पर वही विद्यार्थी यदि किसी अन्य विषय में अपेक्षा से कम अंक पाए तो दुःखी हो जाता है। यहाँ वास्तविकता यह है कि दोनों बार उसे केवल “अंक” ही मिले, परंतु मन की अपेक्षाओं ने दो भिन्न अर्थ गढ़ दिए — एक को उसने सफलता कहा, दूसरे को असफलता। इसी प्रकार एक ही धड़कन, एक ही रोमांच — प्रेम में मधुर लगता है और भय में भारी। रासायनिक दृष्टि से शरीर में वही प्रक्रिया घटित हो रही होती है, केवल मन की व्याख्या बदल जाती है। इसलिए कहा गया है कि सुख और दुःख बाहरी नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अर्थ देने की प्रक्रिया से उत्पन्न होते हैं।
मनुष्य का मन अत्यंत चंचल है; वह हर घटना को अर्थ देने की जल्दी में रहता है। वही वर्षा जो किसान के लिए वरदान है, सड़क बनाने वाले मजदूर के लिए बाधा बन जाती है। वही सूर्य जो यात्री के लिए कष्टप्रद है, सूर्यस्नान करने वाले के लिए आनंददायक है। इस संसार में कोई भी वस्तु अपने आप में न सुख है, न दुःख; यह तो हम ही हैं जो उसे ऐसा अर्थ देते हैं। जब हमारी दृष्टि वस्तु से हटकर घटना के साक्षी भाव में पहुँचती है, तब सुख-दुःख का भेद मिटने लगता है।
जीवन की परिपक्वता का आरंभ तब होता है जब हम यह समझ लेते हैं कि हर अनुभव अस्थायी है। जो सुख आज है, कल वह फीका पड़ सकता है; जो दुःख आज चुभता है, वह भी समय के साथ मिट जाता है। जब यह बोध गहराई से उतरता है, तब हम हर स्थिति को सहज स्वीकार करने लगते हैं। सुख आए तो अहंकार न करें, दुःख आए तो विषाद न पालें। दोनों को एक समान भाव से देखना ही स्थिरता की ओर पहला कदम है।
वास्तविक शांति तब आती है जब हम तरंगों के पीछे झील को पहचानते हैं। झील की गहराई में न सुख है, न दुःख — केवल निश्चलता है। यही निश्चलता आत्मा की प्रकृति है, यही साक्षी भाव है। जो उस गहराई में उतरना सीख लेता है, उसके लिए सुख-दुःख केवल अनुभव बनकर रह जाते हैं, बंधन नहीं।
इसलिए, जीवन को समझने का अर्थ यह नहीं कि हम सुख की खोज करें और दुःख से भागें, बल्कि यह कि हम दोनों को समान भाव से देखें। दोनों समय की तरंगें हैं, जो आती-जाती रहती हैं। जो इन तरंगों से परे झील की गहराई में उतर जाता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन का ज्ञानी कहलाता है — क्योंकि उसने जान लिया कि सुख और दुःख एक ही तरंग के दो रंग हैं, और हम स्वयं वह शांत झील हैं जिसमें वे खेलते हैं।
सुनील बनारसी
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