कहानी:"अनुमति की रस्सी"
कहानी: अनुमति की रस्सी
लेखक – सुनील बनारसी
प्रस्तावना,
शादी केवल दो लोगों का मिलन नहीं होती, दो परिवारों और समाज की अनुमतियों का एक मौन समझौता भी होती है। पर क्या हर रिश्ता समाज की मुहर से ही पवित्र होता है?
“अनुमति की रस्सी” उन्हीं प्रश्नों के बीच चलती एक कहानी है—जहाँ दोस्ती, परंपरा और बदलते विचार एक-दूसरे से उलझते भी हैं और सुलझते भी।
रोशन, अतुल और उनके बाबा रामबिलास के बहाने यह कथा बताती है कि कई बार रस्में तोड़ना ही रिश्तों की नींव को मजबूत कर देता है।
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कहानी:-
मई की गर्म शाम थी। बनारस जिले के कोइलरा गांव के दो जिगरी दोस्त—अतुल और हरि—रोज की तरह उस दिन भी दक्षिण तरफ के विशाल पोखरे की ओर टहलते हुए निकल पड़े। पानी भले ही नदी जैसा न था, पर पूरे गांव के लिए वही सौंदर्य-स्थल, शरणस्थली और तरह-तरह की चर्चाओं का अड्डा था। किनारे सीमेंट की कुछ बेंचें थीं और चारों तरफ बाढ़-घेर ताकि पशु पानी में न उतर सकें।
दोनों अभी बेंच पर बैठ ही रहे थे कि अतुल के मोबाइल पर कॉल आया।
“अरे रोशन जी आ गए!” अतुल ने मुस्कराकर कहा, “यही मेरे होने वाले साले साहब।”
“इंजीनियर वाले?” हरि ने मजाक में पूछा।
“हाँ वही। चलो, मिलकर आते हैं।”
तीनों कुछ देर बाद पोखरे पर लौटे। हरि और रोशन में पहली मुलाकात होने के बावजूद बातचीत सहजता से चल पड़ी। रोशन बनारस के प्रसिद्ध गांव भीमचंडी का रहने वाला था—गंगा किनारे बसा, पुरातन मान्यताओं से भरा। फिलहाल वह मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में एक निजी पावर कंपनी में इंजीनियर था।
शादी की लगभग सभी रस्में तय हो चुकी थीं; बस कन्या पक्ष—यानी रोशन—की अंतिम सहमति बाकी थी। अपने परिवार की ‘हाँ’ के वजन का भरोसा पाने ही वह खंडवा से बनारस आया था।
कुछ देर शांत बैठे रहने के बाद हरि ने बात छेड़ी,
“भइया, एक बात पूछें?”
“पूछिए।”
“क्या आपके यहां भी यही परंपरा है कि दूल्हा शादी के बाद ससुराल तभी जाए, जब विधिवत बुलावा आए?”
अतुल झेंप गया।
“अबे चुप रहो, कैसी बात कर रहे हो!”
लेकिन हरि अब मजाक में नहीं था।
“हमारे गांव में ऐसा ही है। बिना अनुमति के जाना मतलब समाज में नाक कटाना।”
रोशन ने रुचि से पूछा, “और ये परंपरा कब से है?”
हरि ने गहरी सांस ली, “अतुल के बाबा—रामबिलास—बहुत हिम्मती थे। उन्होंने ही सबसे पहले इस रीति को तोड़ा था, लेकिन गांव में आज भी लोग पूरी तरह नहीं मानते।”
“क्या हुआ था?” रोशन ने उत्सुकता से पूछा।
हरि ने किस्सा शुरू किया,
“बात सत्तर के दशक की है। बाबा की शादी नई-नई हुई थी, लेकिन भाभी को ठीक से देख ही नहीं पाए थे। सोचा—चलो बिना बुलावे ससुराल चलते हैं। उनके साथ जिगरी दोस्त लल्लू काका भी थे।”
अतुल हल्के से मुस्कुराया। हरि आगे बोला,
“शाम का समय था। ससुराल में आंगन के पीछे एक पुराना पीपल का पेड़ था। बाबा उसी पर चढ़ गए। सोचा—डालियों के सहारे उतर जाएगा। पर खुद ही रुककर बोले—‘अइसे कूद पड़ेंगें तो चोरी जैसा लगेगा।’”
रोशन हँस पड़ा, “फिर?”
“फिर क्या! कोयल बनने लगे। ‘कुहू… कुहू…’ ताकि घर वाले बाहर आएं।”
अतुल भी हँसने लगा।
“दादी बताती हैं कि जब उन्होंने देखा कि कोयल की आवाज के साथ धोती भी हिल रही है, तो समझ गईं कि ये कोई सामान्य कोयल नहीं!”
हरि ने आंख मारकर कहा,
“और नीचे से लल्लू काका कह रहे थे—‘कुहू कम करो भइया, कहीं ससुर जी डंडा न ले आएं!’”
तीनों ठहाका मारकर हँस पड़े। पोखरे की लहरें शांत थीं पर माहौल उस सत्तर के दशक की ‘कोयल’ से भर गया था।
रोशन ने हँसते हुए कहा,
“मतलब रीतियां तोड़ना भी कला है!”
हरि ने जोड़ दिया,
“गांव में खूब चर्चा हुई। पर बाबा ने पहली बार उस ‘अनुमति की रस्सी’ को ढीला किया था।”
अब रोशन का चेहरा गंभीर हो गया।
“देखिए, परंपरा तभी अच्छी है जब वह रिश्तों में दूरी न बढ़ाए। हमारे भीमचंडी में भी अब बदलाव हो रहा है। परंपरा अगर बांधने लगे तो बंधन नहीं, बंधुआगिरी बन जाती है।”
तभी रोशन के फोन की घंटी बजी। पिताजी थे।
“लड़का ठीक है, सादा स्वभाव वाला है… रिश्ता पक्का समझिए,” रोशन ने कहकर कॉल समाप्त किया।
अगले दिन सुबह रोशन लौटने लगा। अतुल और हरि उसे बस-स्टैंड छोड़ने आए। बस के इंतज़ार में रोशन ने हरि की ओर मुस्कराकर देखा,
“हरि जी, आपके प्रश्न का उत्तर अब देता हूं।”
हरि सजग हो गया।
“हमारे यहां ऐसी कोई परंपरा नहीं जो प्रेम और विश्वास के बीच रुकावट बने। जब चाहो आओ—हमारे घर के सामने से… पीछे से नहीं।”
अतुल हँस पड़ा। हरि बोला,
“तो साले साहब… बारात भी सामने से ही आएगी!”
तीनों हँसे। बस आ गई। रोशन चढ़ गया।
लौटते समय अतुल कुछ खामोश था। हरि ने कंधे पर हाथ रखा।
“कभी-कभी तेरी बातें चुभती हैं,” अतुल बोला, “लेकिन सच कहूं, तू न होता तो रोशन यूं खुलकर न बोल पाता।”
वह शाम केवल एक रिश्ते को मजबूत नहीं कर गई, बल्कि गांव की एक पुरानी परंपरा में एक नई दरार भी डाल गई—एक ऐसी दरार जिसे प्रेम और विश्वास ने गढ़ा था।
सुनील बनारसी
लेखक की कलम से —
सुनील बनारसी
इस कहानी को लिखते हुए मैं बार-बार सोचता रहा कि
हमारे गांवों में रिश्ते अक्सर नियमों से बंधे होते हैं,
जबकि दिल की दुनिया किसी अनुमति की मोहताज नहीं होती।
अतुल, हरि और रोशन की बातचीत में
मुझे समाज की पुरानी रस्सियाँ दिखाई दीं—
कुछ इतनी ढीली कि बस नाम की बची थीं,
और कुछ इतनी कसी हुई कि आज भी कदम रोक लेती हैं।
बाबा रामबिलास का पेड़ पर चढ़ जाना
मुझे हमेशा एक प्रतीक जैसा लगा—
कि जब इच्छा सच्ची हो,
मनुष्य किसी भी परंपरा की दीवार पर चढ़ सकता है।
अंत में, इस कथा को लिखते हुए मैं यही कहना चाहता हूँ—
परंपराएं तब तक सुंदर हैं, जब तक वे इंसान को रोकती नहीं;
जब रोकने लगें, तो फिर किसी रामबिलास की जरूरत होती है,
जो एक पीपल की डाल पकड़कर कहे—
रिश्ता अनुमति से नहीं, मिलने की इच्छा से पवित्र होता है।
—सुनील बनारसी