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22 Nov 2025 · 7 min read

कहानी — मन का कीड़ा

कहानी — मन का कीड़ा
लेखक: सुनील बनारसी

प्रस्तावना,
हर समाज में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनकी आत्मा दूसरों की शांति में बेचैन हो उठती है। उन्हें चैन, प्रेम, और स्थिरता एक बोझ लगती है। ऐसे लोग बाहर से सामान्य दिखते हैं, लेकिन भीतर एक कीड़ा पलता है — जो उन्हें साजिश, झगड़े और विघटन की ओर उकसाता है। यह कहानी हरभजन की नहीं, बल्कि उस मानसिक विकृति की है जो एक पूरे गांव, परिवार, और अंततः स्वयं को विनाश की ओर ले जाती है।
“मन का कीड़ा” एक चेतावनी है — कि हमें केवल कर्मों पर ही नहीं, विचारों की शुद्धता पर भी निगाह रखनी चाहिए। क्योंकि जब मन सड़ता है, तो संबंध, समाज और स्वयं जीवन भी सड़ने लगता है।

सुनील बनरसी

कहानी: “मन का कीड़ा”

हरभजन गांव का एक सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति था, पर उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचैनी और माथे पर अनायास ही उठती भौंहें, उसके मन की हलचल का संकेत देती थीं। वह किसी और को नहीं, खुद को भी यह समझा नहीं पाया कि उसके भीतर एक ऐसा तत्व है जो न तो उसे स्थिर रहने देता है, न दूसरों को चैन से जीने देता है।
कभी-कभी गांव के बुजुर्ग बैठकों में कहते, “हरभजन के भीतर कोई ‘मन का कीड़ा’ है। जो जहां सुखी होता है, वह वहीं पहुंचता है और वहां अशांति फैलाने का काम करता है।”
युवावस्था मे ही विद्रोह और घमंड का आरंभ था।हरभजन का बचपन कठिन नहीं था। घर में तीन भाई, खेत-खलिहान की संपत्ति और सामान्य जीवन। पर युवावस्था में उसके मन में असंतोष जन्मा। वह खुद को सबसे समझदार, सबसे योग्य मानने लगा। गांव की किसी पंचायत में बिना बुलाए ही चला आता और दूसरों की बात काटने लगता। यदि कहीं दो घरों में आपसी रजामंदी से शादी तय हो रही होती, तो वह कह उठता:

“अरे ओ गंगाराम, लड़की के बाप को देखे हो? पाँच साल पहले उसके बेटे पर चोरी का आरोप लगा था। ऐसे घर में बेटी दोगे?”

बात बिगड़ जाती, शादी टूट जाती, और हरभजन अपने आप को सफल मानता। उसका यह व्यवहार धीरे-धीरे गांव को खटकने लगा। वह जहां भी जाता, वहां झगड़ा जरूर होता। किसी को “भ्रष्ट”, किसी को “नालायक”, किसी को “धूर्त” बता देता।

एक बार गांव के ऊपर से जाने वाली मुख्य नहर में अच्छे-खासे पानी की आमद हो रही थी। यह पानी दो गांवों में बराबर बांटने का प्रावधान था। लेकिन हरभजन ने अपनी चाल चली। उसने नहर के पाट में मिट्टी डालकर रास्ता रोक दिया और यह झूठ फैला दिया कि बांध से पानी अब बंद हो गया है, इसलिए जितना पानी है, वही गांव में रोक लेना चाहिए।

अगले दिन प्रशासन को खबर मिली। जांच करने अधिकारी आए। पता चला कि अज्ञात ने नियमविरुद्ध पानी रोकवाया है, जिससे दूसरा गांव पूरी तरह सूखा रह गया। मामला गंभीर हो गया। अफसरों ने गांव के प्रधान से लेकर कई किसानों पर मुकदमा कर दिया, एफआईआर हुई, गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन हरभजन को जैसे भनक पहले ही लग गई थी, वह गांव छोड़कर भाग निकला। आज तक वह घटना गांव के माथे पर कलंक की तरह है।

कई परिवारों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़े, फसलें बरबाद हुईं, और जिन घरों में पहले ही गरीबी थी, वहां अब कर्ज और बदनामी जुड़ गई।

लोग समझने लगे थे कि हरभजन की संगत में रहना खतरे से खाली नहीं। वह सन्देह का बीज बोता, अफवाह फैलाता, और लोगों के दिलों में दूरियां पैदा करता। धीरे-धीरे गांव उससे कतराने लगा। कोई भी परिवार उसे अपने घर बुलाने से कतराता। आमंत्रण मिलने पर भी लोग उसके आने से पहले ही चर्चा कर लेते:

“देखो, हरभजन आए तो ज्यादा बोलने का मौका मत देना, नहीं तो कुछ नया पंगे करेगा।”

जब समाज ने दूरी बना ली, तब हरभजन का कीड़ा अपने ही भाइयों की ओर मुड़ा।

उसने अपने छोटे भाई से एक दिन कहा, “तुम ही सब कुछ देखते हो घर का। बड़ा भाई हूं कि नौकर बना दिया है। सब मेरे ही हिस्से का खा रहे हो।”

छोटे भाई ने समझाने की कोशिश की, “भइया, सब बराबर है। पिताजी के हिसाब से ही बँटा है।”

पर हरभजन को सत्य से नहीं, विवाद से प्रेम था। उसने भाइयों में अविश्वास पैदा कर दिया। खेती का बंटवारा हो गया, घर के आंगन की दीवार तक खिंच गई। उसकी मां ने कहा:

“बेटा, तूने क्या कर डाला? घर जोड़ा नहीं, तोड़ा।”

हरभजन बोला, “मां, मैंने कुछ नहीं किया। ये खुद ही स्वार्थी हैं।”

मां चुप हो गई, पर उसके भीतर पीड़ा के ज्वार उठने लगे।

उम्र बढ़ी, मां-बाप गुजर गए। बेटे की शादी हुई। बहू घर आई, तो कुछ दिन सब ठीक चला। पर हरभजन कहां रुकने वाला था।

उसने बेटे से कहा, “तुम्हारी बीवी देर तक सोती है। मेरे समय में बहुएं सूरज निकलने से पहले उठ जाती थीं।”

बहू को कटाक्षों में दोष नजर आने लगे। कुछ ही महीनों में हरभजन ने घर का वातावरण बोझिल कर दिया।

बेटे से बोले, “तू अब मेरी नहीं, अपनी बीवी की सुनता है।”

घर में कलह बढ़ा। अंततः बेटा-बहू ने अलग घर ले लिया। अब हरभजन अकेला था, लेकिन संतुष्ट नहीं। कुछ दिन तो बहू को दोष देता रहा, फिर अपनी पत्नी की ओर झुक गया।

पत्नी ने धीरे-धीरे उसके स्वभाव को पहचान लिया था। एक दिन चुपचाप बोली:

“हरभजन, अब तो भगवान से एक ही प्रार्थना है — ऐसा मन का कीड़ा किसी को न दे। जब जवान थे, गांव में सब से लड़ते थे, सुख से जीने नहीं देते थे। भाई अलग हुए तो तुमने उन्हें भी जीने नहीं दिया। अब बेटे-बहू भी अलग हो गए। अब मेरी बारी है। मैं भी अब तुमसे दूर रहना चाहती हूं।”

हरभजन सन्न रह गया। जीवन का सारा दर्प चूर हो गया। अकेलेपन की भयावहता ने उसे घेर लिया।

मनुष्य जब समाज के सुख में अपना दुख ढूंढने लगता है, तब वह स्वयं समाज के लिए रोग बन जाता है। ऐसे लोग न केवल अपना जीवन विषाक्त करते हैं, बल्कि हर उस संबंध को भी नष्ट करते हैं, जिसमें प्रेम, त्याग और सामूहिकता का बीज होता है। हरभजन जैसे लोग नदियों को मोड़ने की ताकत नहीं रखते, लेकिन वे मनुष्यता के प्रवाह को जरूर रोक लेते हैं — अपने मन के कीड़े से।”

पत्नी मायके चली गई थी — चुपचाप नहीं, बल्कि अपने भीतर के वर्षों के बोझ को उतार कर, झाड़कर, और पीठ फेरकर। जाते समय उसने न तो रोटी पकाई, न ही घर की चाभी संभाली — उसने सिर्फ एक बात कही थी:

“जिस घर में केवल देह रहती हो, आत्मा नहीं — वह घर नहीं होता, वह बस एक जर्जर कोठरी होती है। अब तुम उसी कोठरी में रहो — अकेले।”

हरभजन अब खाट पर पड़ा था। पहले कुछ दिन वह इधर-उधर ताकता, कभी बहू को पुकारता जो अब साथ नहीं थी, कभी बेटा याद आता जिसे उसने खुद पराया कर दिया था।

फिर धीरे-धीरे वह बड़बड़ाने लगा।
कोई पास आता, तो बेमतलब की गालियाँ देने लगता —
“सब मिल गए थे मेरे खिलाफ… सब हरामखोर हैं… कोई सगा नहीं है…”

पर अब कोई जवाब नहीं देता।

घर सुनसान था, चूल्हा ठंडा पड़ा था, और कीड़े की तरह हरभजन खुद को ही अंदर से काटता जा रहा था। उसे अब खाने की भी सुध न थी। एक वक्त था जब गांव में उसकी चाल पर लोग रास्ता छोड़ देते थे, अब उसी रास्ते से दूध वाला भी बिना आवाज़ दिए निकल जाता था।

तीसरे हफ्ते की सुबह वह बिलकुल चुप हो गया।

किसी ने अवाज लगाई —
“हरभजन काका… ओ काका!

कोई जवाब नहीं मिला।

जब पास जाकर देखा गया, तो उसकी आंखें खुली थीं — पर उनमें अब कोई जुगनू नहीं, कोई चालाकी नहीं, कोई गुस्सा नहीं — बस एक सूखा, ठंडा सन्नाटा था।

हरभजन मर गया था।

“हरभजन मरा नहीं, अपने मन के कीड़ों द्वारा खाया गया। जो दूसरों की मुस्कान से चिढ़े, वह कभी अपना सुख भी नहीं गढ़ सकता। समाज को तो उसने बांधों, झगड़ों और चालबाज़ियों से दुख दिया ही — पर अंत में वह खुद भी उसी ताने-बाने में उलझ कर छटपटाता रहा, जब तक कि जीवन की आखिरी सांस भी तिरस्कार की भेंट नहीं चढ़ गई।”

“ऐसे लोग हमारे बीच होते हैं — साफ कपड़े पहनते हैं, मीठा बोलते हैं, पर भीतर जलन, शंका और विघटन के कीड़े पालते हैं। इनकी पहचान जरूरी है — क्योंकि यदि देर हो गई, तो एक हरभजन पूरे गांव,परिवार ,पुत्र,पत्नी,रिस्तेदरों को मुसीबत मे डाल सकता है। और अंत में… खुद अकेला है।”

समाज को चाहिए कि वह इन व्यक्तियों को समय रहते पहचान ले। उनके झूठे आरोपों, फूट डालने की आदत, और अफवाह फैलाने की शैली को समझे। उनसे बहस न करे, बस दूरी बना ले।

सच्ची मानवीयता यही है — कि हम हर घर को प्रेम, विश्वास और सम्मान से भरें, न कि हरभजन जैसे मन के कीड़ों से।

सुनील बनारसी🙏🙏🙏

© 2025 सुनील बनारसी. सर्वाधिकार सुरक्षित।
यह रचना लेखक की मौलिक संपत्ति है। बिना अनुमति कोई भी उपयोग, प्रकाशन या रूपांतरण प्रतिबंधित है।

लेखक की कलम से — मन का कीड़ा
सुनील बनारसी

शरीर के घाव दिखते हैं, मन के नहीं। शरीर पर कीड़ा पड़े तो इलाज आसान है — दवा, पट्टी, डाक्टर। लेकिन मन में जब कोई अदृश्य कीड़ा घर बना लेता है, तब न कोई चीख सुनाई देती है, न कोई खून बहता है — पर भीतर सब कुछ सड़ने लगता है।
“मन का कीड़ा” कोई जीवाणु नहीं, एक प्रवृत्ति है — दूसरों के सुख से चिढ़ने की, हर स्थिरता को हिलाने की, और हर रिश्ते को तोड़ने की। यह अकेले नहीं पलता, समाज की चुप्पी, परिवार की सहनशीलता और अपनों की मजबूरी इसे पालती है।
हरभजन अकेला नाम नहीं, वह हर गांव, हर गली, हर घर में किसी न किसी रूप में मौजूद है। सवाल यह नहीं कि कीड़ा है या नहीं — सवाल यह है कि हम उसे पहचान पा रहे हैं या नहीं।🙏🙏🙏🙏🙏

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