कविता: दादा लड़े थे गोरो से'
कविता: दादा लड़े थे गोरो से’
दादा लड़े थे गोरो से,
हम लड़ें सातिर चोरो से,
खून बहा था धरती माँ पर,
अब जूझे है ज़ोरों से।
नीति बिके हैं बाजारों में,
सत्ता झुकी हुजूरों से,
सच की लौ अब डरती है,
झूठे दस्तूरों से।
जन का हक़ अब लुटता है,
जनता मरे कतारों से,
लोकतंत्र की शान सजी,
कुर्सी के दरबारों से।
देशभक्ति का अर्थ बदला,
नारे हुए व्यापारों से,
लाल किले की दीवारों तक,
सवाल उठे अखबारों से।
हे बनारसी! मत झुको अब,
सत्य बनो अंगारी बन,
कलम उठाओ, लिख दो फिर —
भारत की तैयारी बन।
सुनील बनारसी
लेखक की कलम से:-
यह कविता मेरे उन अनगिनत पूर्वजों को नमन है, जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के आगे झुकने से बेहतर संघर्ष चुन लिया। उनके साहस ने मुझे यह लिखने की शक्ति दी कि आज़ादी केवल इतिहास की वस्तु नहीं, बल्कि हर रोज़ निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है।
आज जब सच दबाया जा रहा है और जनता का हक़ लुट रहा है, तब मुझे लगता है कि कलम को फिर से हथियार बनाना होगा। यही उद्देश्य लेकर मैंने यह काव्य लिखा—ताकि हम याद रखें कि लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है, बस उसका रूप बदल गया है।
मेरी आशा है कि यह कविता पाठकों में चेतना की एक नई लौ जलाएगी और उन्हें सत्य, न्याय और देशहित के लिए खड़े होने की प्रेरणा देगी।
— सुनील बनारसी
कॉपीराइट © सुनील बनारसी