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22 Nov 2025 · 2 min read

कवीता: "खेल और मोह"

कवीता: “खेल और मोह”
✍️ सुनील बनारसी

जयध्वनि से गगन गुंजता,
करतल-ध्वनि अभिनंदन पाए।
किन्तु वहीं चूल्हा बुझता ,
ग्राम-नारी भूख सह जाए।

लघु क्षण की झलक मात्र में,
जीवन की अनकही कथा है।
नट खेल रहा मंच के ऊपर,
नीचे पीड़ा की व्यथा है॥

क्रीड़ा का उद्देश्य मनोरथ था,
अब वह बन गया व्यापार।
जहाँ पुरुषार्थ नहीं दिखता,
मूल्यांकन है केवल बाज़ार।।

क्रीड़ांगन में बिखरी माया,
मोह-जाल में बंधता नर।
स्वयं तिरस्कृत जीवन लेकर,
नाच रहा है बंधी स्वर॥

दर्शक भाव-विवश हो जाता,
तन्मय हो सब भूल रहा।
स्वत्व-धर्म विस्मृत कर वह,
नायक को ईश्वर मान रहा।

क्या जयघोषों से पेट भरेंगे?
क्या तालियों से दीप जलेंगे?
यदि श्रमहीन बने आराध्य तो,
कर्म-पथ कैसे उज्ज्वल होंगे?॥

क्रीड़ा दोष नहीं स्वयं में,
दोष है केवल अंधमति में।
जब चेतना सुप्त हो जाए,
मिटती जाती है बुद्धि गति में।

जो भावनाओं से चलता है,
विवेक रहित राह पकड़ता है।
वह अंततः साधन बन जाता,
औरों का वैभव गढ़ता है॥४॥

इसलिए समय है अब जागें,
मोह-जाल को दूर हटाएँ।
स्व-अस्तित्व की पुनर्रचना में,
आत्म-धर्म को पुनः जगाएँ।

मनोरंजन मर्यादा में ही,
श्रेयस्कर लगता है सुंदर।
अति हर बात में दोष समाहित,
जीवन तप है ,जागरण अंतर्मन पर॥

हे बनारसी! चेतो अब तुम,
तुम हो श्रमिक, तुम ही आधार।
मोह-जाल से बाहर आकर,
फिर रच दो नव युग का सार।।

सुनील बनारसी🙏🙏🙏🙏

©️ सुनील बनारसी
यह कविता लेखक की मौलिक रचना है।
पुनः प्रकाशन, प्रचार या किसी भी रूप में उपयोग बिना अनुमति वर्जित है।

लेखक की कलम से
✍️ सुनील बनारसी

मनुष्य मात्र भावना का भूखा है — और जब भावना, विवेक को पीछे छोड़ दे, तब वह किसी और के स्वप्न में जीने लगता है। खेल, मनोरंजन, जयघोष — ये सब जीवन को सुशोभित कर सकते हैं, परंतु जब यही हमारे श्रम, चेतना और आत्मबोध को निगलने लगें, तो यह मोह नहीं, बंधन बन जाते हैं।
यह कविता उसी बंधन पर चोट है — एक विनम्र प्रयास है जागरण का, आत्मचिंतन का, और इस प्रश्न का कि हम किसे पूज रहे हैं — और क्यों।
यदि यह कुछ पल के लिए भी पाठक को सोचने को विवश कर दे, तो मेरी कलम सफल मानी जाएगी। 🙏🙏🙏

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