मुलम्मा
जैसा था वैसे कहता था,
अपने सुर लय में रहता था।
मिथ्या तड़का न लगाता था,
सब सही सही बतियाता था।
श्रृंगार बिना मैं था गंवार,
निज को डाला थोड़ा संवार।
एक बार नहीं,अब बार बार,
सब करते कितना मुझे प्यार।
अब मन में छलावा है केवल,
वर्तमान दिखावा है केवल।
दो चार कपट कर लेता हूं
सबके मन को भर देता हूं।
बोलने में है कोई गमीं नहीं,
बातों की कोई कमी नहीं।
मक्कारी अब अनगिनती है,
पर सभ्य जनों में गिनती है।
जग रीति के सम डाला संवार,
अब सृजन नहीं कतई गंवार।
रवि सोम गुरु या जुम्मा है,
सातों दिन चढ़ा मुलम्मा है।