कविता - अकेलापन
शिखर की ऊंची बुलंदी,
आज मुझे कुछ कह रही।
पत्थर सा हृदय रख,
और बहने दे निर्मल सी नदी।
निर्जन वन में अकेला रहकर,
वीरानगी का आनंद ले।
बिछड़े पत्तों की बातें सुन,
जीवन उनमें खो जाने दे।
आसमान से गिरते सितारे,
अपनों का संग छोड़ चले।
वजूद जिनका चमकने में था,
ज़मीन पर आकर बिखरने लगे।
स्वार्थी लोगों की दुनिया में,
झूठे इंसान बन बैठे।
सच ने जब कोशिश की तो,
ईमानदार बेईमान बन बैठे।
मंजिल तू न ढूंढ, बटोही,
सुकून मन का खोज।
मिट्टी की है काया अपनी,
और जीवन अपनी सोच।
कवि- राज कुमार झा