एकांकी-: (बेटियाँ)
एकांकी-: (बेटियाँ)
दीनानाथ – लड़कियों का पिता
उषा – दीनानाथ की बड़ी लड़की
विद्या – दीनानाथ की सबसे छोटी बेटी
सुशीला – दीनानाथ की दूसरी बेटी
काजल – दीनानाथ की चौथी बेटी
फेरीवाला -” चना ले लो, चना ले लो
( एक खटिया पर लेटा हुआ व्यक्ति जोर-जोर से खास रहा था। तभी एक व्यक्ति खांसी की आवाज सुनकर आता है और बोलता है।)
“दीनानाथ क्या हुआ, तुम्हे तो बहुत ही खांसी हो रही है डॉक्टर से क्यों नहीं दिखा लेते।
दीनानाथ- दिखाया था, परंतु डॉक्टर ने कहा कि आपके पास समय कम है। मुझे टी.वी की बीमारी है। जीवन का कोई ठीक नहीं, वह कभी भी खत्म हो सकता है। सबसे ज्यादा चिंता मुझे अपनी बेटियों का है । मेरी पांच बेटियां हैं। इनकी मां, छोटी के जन्म के समय ही चल बसी थी। अब इनका मेरे सिवा कोई नहीं है। मेरे जाने के बाद इनका क्या होगा? पता नहीं।
उषा(दीनानाथ की बड़ी बेटी) :- ऐसे क्यों बोलते हो बाबूजी। ऐसे मत बोलो न। आपके सिवा मेरा कोई नहीं है। मां भी चुपचाप चली गई भगवान के पास। यदि आप भी भगवान के पास चले जाओगे, तो हम लोग अनाथ हो जाएंगे और आप जानते हो ना अनाथ को यह दुनिया जीने नहीं देती है। चील की तरह नोच कर खा जाने वाली यह दुनिया है बाबूजी। आप हम लोगों को अकेला छोड़कर नहीं जा सकते हैं। (पिता जोर-जोर से खांसते है और धीरे-धीरे उनकी साँसें छूटने लगती है। कुछ ही देर के बाद उनकी मृत्यु हो जाती है)
(आसपास के लोग इकट्ठा हो गए और चर्चा करने लगे कि अब इन बच्चियों का ख्याल कौन रखेगा)
एक व्यक्ति ने कहा- ” मैं इस छोटी लड़की को अपने पास रख लूंगा। मैं इसका पालन पोषण करूंगा।
विद्या- दीदी, मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। ( सभी बहन एक जगह इकट्ठा हो जाती है)
सुशीला- (दीनानाथ की दूसरी बेटी) – दीदी, बाबूजी चले गए तो क्या हुआ, आप तो है न! आप ही हम लोगों की देखभाल कीजिए। आप हम लोगों को बिछड़ने से बचाएगा न दीदी। बोलिए ना दीदी, दीदी, दीदी।( सभी बहन आपस में गला पकड़ कर रोने लगती हैं)
उषा- मेरी बहनों तुम चिंता मत करो। जब तक मुझ में जान है, तब तक तुम्हें मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता।
( फिर दीदी जमाने के डर से कि कोई मेरी बहनों को मुझे अलग ना कर दे। घर से निकलना ही छोड़ देती हैं)
सुशीला- (दीनानाथ की दूसरी बेटी):- दीदी हम लोग घर से बाहर क्यों नहीं निकलते। कब तक, हम लोग घर में ही रहेंगे? पिछले 5 दिनों से हम लोग घर से बाहर नहीं निकले हैं । आखिरकार जमाने के डर से कब तक चुपचाप घर में ही रहेंगे। देखो ना, मेरे पांव में घाव निकल आया है। यह घाव बहुत दर्द करता है। मुझे बचा लो ना दीदी।
उषा- कैसे तुझे बाहर लेकर जाऊंगी। पूरे गांव के लोगों का नजर हम पर है। यदि तुम्हें मैं बाहर लेकर जाऊंगी, तो गांव के लोग, हम लोगों को अलग कर देंगे। समझती क्यों नहीं हो।
सुशीला- (दीनानाथ की दूसरी बेटी)- दीदी हम लोग 5 दिनों से कुछ भी नहीं खाए हैं। मुझे भूख बहुत जोरों कि लगी है। घर में अब कुछ नहीं बचा है( दीदी सुनो ना भूख से पेट दर्द कर रहा है कुछ ला दो ना बाहर से)
काजल( दीनानाथ की चौथी बेटी)- बहुत सर दर्द कर रहा है।
उषा- तुझे तो बहुत बुखार है। रुक तो जरा तेरे लिए ठंडी पट्टी लाती हूं (बहन ठंडी पट्टी लगती है और लगातार लगाती रह जाती है सभी छोटी बहन के चारों तरफ बैठी रहती हैं। अचानक छोटी बहन दम तोड़ देती है। सभी बहनें ज़ोर- ज़ोर से रोने लग जाती हैं।)
“मुझे माफ कर दे मेरी बहन”
“दुनिया के डर से तुझे बाहर नहीं निकलने दी”
तेरी मौत का जिम्मेदार, मैं हूं।
हे भगवान मैं क्या करूं?
बाहर जाऊँ तो इंसान के रूप में जो हैवान बाहर बैठे हैं वह हमें जीने नहीं देंगे और कब तक घर के अंदर रहकर अपनों की मौत को देखते रहूंगी।
मेरी बहन तू भी चली गई( रोते हुए)
हे भगवान कैसा आपका न्याय है।
सुशीला- दीदी कब तक हम लोग घर में रहेंगे, हमें बाहर निकलना होगा। ज़माने के डर से चुपचाप घर पर बैठ नहीं सकते। ऐसे मैं तो हमलोग ख़त्म हो जायेंगे। लड़की है तो क्या हुआ ज़माने से लड़ेंगे और इस ज़माना को दिखा दे की लड़कियाँ यदि कुछ ठान लेती हैं तो फ़िर कोई उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
(फ़िर लड़कियाँ आपस में गले लग कर रोने लगती हैं)
उषा- हमलोग अब एक दूसरे का सहारा बनेंगे। हम कभी भी अलग नहीं होंगे। एक अलग पहचान अपनी इस दुनिया में बनाएंगे
(और इस तरह पाँचों बहने घर से पहली बार हिम्मत करके निकलती हैं संघर्षों की राह चुन कर सफलता का नया कीर्तिमान स्थापित करती हैं)
लेखक- Raj kumar jha