राष्ट्रप्राण राम
///राष्ट्रप्राण राम///
हे भरत भूमि के नव राष्ट्र प्राण,
तुम भारत का शुचि अन्तर गान।
राम! संस्कृति रक्षक राष्ट्र प्रणेता ,
विशाल हृदय सद्-गुण आव्हान।।
तुमने दिया विश्व सुराज के स्वर,
जाग्रत वाणी गगन दिशाएं निर्झर।
मर्यादा की परिभाषा सिखलाई,
दी न्याय तत्व की व्याख्या सुखकर ।।
मर्यादा सत्य न्याय के रखवाले ,
अवतारी गुणाधार प्रभु राम हमारे।
अविचल अटल पथिक तपस्वी वे,
बने जननायक जन जन के प्यारे।।
हे विश्व वंद्य राम तुम ही हो,
अविचल सत्य धर्म की गाथा।।
अखंड भारत सकल विश्व भी,
नतमस्तक तुम्हें टेकता माथा।।
राम राज्य का स्वर स्वतंत्रता,
न्याय नीति धर्म प्रतिपालक।
तेजो पुंज हो इस जगती पर,
प्रजा हित आदर्श संचालक।।
राम ही युग युग की शक्ति,
तुम असुर निकंदन परित्राता।
राष्ट्र प्रणयिनी शक्ती उद्-भव,
हरते जन परिताप मुक्तिदाता।।
तुम्हारी आत्म शक्ति हे प्रभु,
हमें सत्य मार्ग दिखलाए।
धन्य धन्य होवे राष्ट्र पताका,
जो तेरे ही स्वर नित गाए।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)