वीरांगना झलकारी बाई
धधक उठे थे रण के मैदान,
झाँसी की धरती का अभिमान,
रानी के संग खड़ी थी वो वीरांगना,
वह थीं झलकारी—दुर्गा अवतार समान।
घुँघराले बादल-से उड़ते थे केश,
विद्युत चमक समान नयन थे तेज ,
अंग-अंग प्रस्फुटित थी ऐसी ज्वाला ,
भयभीत हो उठे शत्रु देख वो वीर बाला ।
स्वाभिमान की ढाल लिए,
धर्म–धरा की शान लिए,
कदम बढ़ाया रण के अंदर,
प्राण तज दिए रानी बनकर ।
गोली–बारूदों की बारिश में भी ,
अडिग, अचल, पर्वत-सी खड़ी रही,
एक देह में साहस था असीमित,
झलकारी सब पर भारी पड़ी।
रानी का रूप धरकर निकली वो ,
भ्रम में पड़ा शत्रु था जो
चतुराई , वीरता से सामना किया था उसने ,
झाँसी का गौरव गूँजा था जग में।
बलिदान उसका हो गया अमर,
इतिहास लिख गई वो अमर- गाथा,
झलकारी बाई— थी एक ऐसी वीरबाला,
अपने प्राणों की आहुति से दे गई जग को दिशा ।
नमन है ऐसी वीरांगना को,
जिसने राष्ट्र का मान बढ़ाया,
मिट्टी, मातृभूमि, स्वाधीनता हेतु,
अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिखाया।