#लघुकथा...
#लघुकथा…
ऐसी भी क्या मजबूरी..?
(प्रणय प्रभात)
हमार एक पड़ोसी थे। तीन मंज़िला घर में रहते थे। तीन मंज़िल का एक लाभ था। पता चलता था बर्थ डे पर। बर्थ डे भी उनके बेटे का। बेटा भी केवल एक। हर साल मनाते थे बर्थ डे। तब काम आती थीं तीनों मंज़िलें। समझ में आता था एक लाभ। एक दो नहीं लगभग हर साल।
बर्थ डे होता था एक। मनता था तीनों मंज़िलों पर। भूतल पर होते थे मोहल्ले के बच्चे। गिफ्ट में पेन या कंपास लाने वाले। बिस्किट का पैकेट या चॉकलेट लेकर आने वाले। इन्हें नसीब होता था नाश्ता। कागज़ की प्लेट पर पारले के 2 बिस्कुट। साथ में 20 ग्राम मिक्चर नमकीन। एक अदद केला और नल का पानी। प्लास्टिक के हल्के डिस्पोजल में।
दूसरी मंज़िल पर होते थे समाज और सहकर्मियों के बच्चे। इनके नाश्ते की प्लेट थोड़ी अलग होती थी। उसमें बढ़ जाती थी एक इमरती। साथ ही एक समोसा या आलू बड़ा। पानी का गिलास थोड़ा ठीकठाक सा। पानी भी शायद आरओ वाला। वजह 11 या 21 रुपए का प्रिंटेड लिफ़ाफ़ा।
तीसरी मंज़िल अधिकारियों और क़रीबी रिश्तेदारों के लिए। व्यवस्था नाश्ते से कुछ अलग। छोले भटूरे के साथ गाजर का हलवा। सलाद, पापड़ और कॉफी के साथ। सबके साथ केक के पीस। दो पौंड वाले के कम से कम बीस से तीस। क्रॉकरी में खाना और पानी स्टेनलेस स्टील के गिलास में। जो एक बार किकलते थे साल में। सूट और मंहगी गिफ्ट्स का अहसान चुकाने।
यह फॉर्मूला वो बरसों पहले ईजाद कर चुके थे। उस दौर में जब इतना छल नहीं था। मतलब आज ऐसा कुछ नहीं, जो कल नहीं था। समझ में न कल आता था, न आज। केवल यह एक बात। क्या ज़रूरत थी इस ग्रेडिंग की? चोरी छिपे किए जाने वाले तामझाम की। जिसकी पोल अगली सुबह खुल ही जाती थी। जब स्कूल या ग्राइंड में एकजुट होते थे बच्चे। वो भी तीन कैटेगिरी वाले। एक ही जगह पर।
अब भी समझ नहीं आती ये बात। आख़िर क्यों करनी पड़ती थी इतनी खुराफ़ात? बुलाते ही क्यों थे ऐसी जमात? जिनकी नहीं थी कुछ मंहगा देने की औक़ात। ख़ासमख़ास को ही बुला लेते। एक ही मंज़िल तक बनी रहती भागा दौड़ी। एक ही बेटा, एक ही बर्थ डे। एक ही आयोजन और तीन मंज़िल हैरान। फ़ोकट में धूर्तता की मिसाल तो न बनते। यह जानते हुए भी कि काम मोहल्ला ही आना था। अच्छे में भी, बुरे में भी। वो भी मनुहार कर कर के बुलाने पर नहीं। अपने मन की आवाज़ पर। पड़ोसी होने का धर्म निभाते हुए।
संपादक
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श्योपुर (मप्र)