दास्तान नई, जड़ें पुरानी
सतनामधर्मी बौद्ध काल से भी पहले के हैं। नारनौल में सतनामधर्मियों का उत्कर्ष उनका आरम्भ ना होकर पुनर्जागरण था। जब कभी किसी वस्तु , मानव या सम्प्रदाय का एक बार बीजारोपण हो जाता है तो वे कभी खत्म नहीं होते। समय के साथ उत्थान और पतन का दौर चलता रहता है। अर्थात अनुकूल माहौल पाने से वे फिर से उग आते हैं, जीवित हो जाते हैं। सत्रहवीं सदी के मध्य में नारनौल में वीरभान जी के नेतृत्व में सतनामियों के उत्कर्ष की दास्तान नई हो सकती है, लेकिन जड़ें तो पुरानी ही थीं।
मेरी 73वीं कृति : “सतनामधर्मियों की ऐतिहासिकता” से…।
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
साहित्य वाचस्पति
भारत भूषण सम्मान प्राप्त
हरफनमौला साहित्य लेखक