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21 Nov 2025 · 7 min read

सीता श्यामा शवारूढा

।। श्रीश्यामास्वरूपायै सीतादेव्यै नमः।।

सीता श्यामा शवारूढा

माता श्यामा (काली) भगवतीक शवारूढा स्वरूप अतिप्रसिद्ध अछि। मिथिलाक जतए-जतए काली मन्दिर अछि, ओहि सभ मे प्रायः शवारूढा कालीक स्वरूपे स्थापित अछि। शवक रूपमे भगवतीक चरणक नीचा शिवकेँ देखाओल जाएत अछि।
माता श्यामा भगवतीक शवारूढा स्वरूप जे हमरा सभकेँ उपलब्ध होएत अछि, ओहि स्वरूपक कथा कोन ग्रन्थ मे वर्णित अछि? एहि जिज्ञासाक समाधानार्थ अन्वेषण कएलाक बाद ज्ञात भेल जे शवारूढा श्यामा वा कालीक स्वरूप विशेष परिस्थिति मे जनकन्दिनी जानकी सीता द्वारा धारण कएल गेल रूप अछि। अर्थात् शवारूढा श्यामा कियो आन नहि अपि तु साक्षात् जगज्जननी जानकी सीता जी छथि।
जानकी सीताजीक एहि रूपक वर्णन अद्भुत रामायण (संस्कृत) के 17म सँ 27म सर्ग मे आ महाकवि लाल दास द्वारा विरचित रमेश्वरचरित (मैथिली भाषा मे रचित आ मिथिला रामायण एहि नाम सँ प्रसिद्ध) रामायण के पुष्करकाण्ड मे उपलब्ध होएत अछि।
एहि दूनू रामायण मे सीता द्वारा धारित शवारूढा श्यामाक वर्णित कथाक सारांश एहि ठाम हम यथामति प्रस्तुत कऽ रहल अछि-
लंकाधिपति दशमुख रावणक वधक पश्चात् जखन श्रीरामचन्द्र जी वापस अयोध्या अएलाह आ राज्यारूढ भेलाह तकर किछु दिनक बाद पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारो दिशा सँ ऋषि-मुनि लोकनि श्रीरामचन्द्रजीक अभिनन्दन करबाक लेल अयोध्या अएलाह।
सभ ऋषि-मुनि श्रीराम के प्रशंसा करैत कहलखिन जे हुनकर सुपुत्र मेघनाद के संग रावण के वध सँ दुनिया में शांति स्थापित भ गेल अछि । आब सभ लोक सुख आ शांति सँ रहत। श्रीमान् जीक पराक्रमक प्रशंसा अवर्णनीय अछि । एहि अवसर पर श्रीरामचन्द्रजीक सभ भाय, मंत्री आ धार्मिक अधिकारीक संग सीताजी सेहो उपस्थित छलीह। एहि अवसर पर सीता राम के प्रशंसा पर हँसि देलीह ।
सीताक असामयिक हँसी देखि ओतय उपस्थित सब ऋषि, तपस्वी आ अन्य लोक चकित भऽ गेलाह । तखन ऋषि लोकनि सीता सँ हुनकर हँसबाक कारण पूछलखिन्ह तत्पश्चात ऋषि लोकनिक आदरपूर्ण आज्ञा प्राप्त कए सीता सभा मे बजलीह, “श्रीराम केँ अहाँ जे स्तुति केलहुँ से हमरा मजाक जकाँ बुझाइत अछि। दसमुख रावणक वधक बाद सेहो ई संसार राक्षस सँ रहित नहि भेल अछि। एखनो एकटा आओर सहस्रमुख रावण संसार मे बचल अछि जे दसमुख रावणक अग्रज छथि।” ओ सम्प्रति पुष्कर द्वीप पर निवास करैत छथि जा धरि ओहि रावण केँ सेहो मारल नहि जायत ता धरि एहि संसार मे सुख आ शान्तिक कल्पना मृगतृष्णा जकाँ होयत। ओकर वध संसार मे सुख आ शांति लेल आवश्यक अछि। राम ओकर वधक बादे अभिनन्दनक पात्र भऽ सकएत छथि ।
अहाँ केँ सहस्रमुख रावणक जानकारी कत सँ भेटल? ऋषि लोकनिक एहि स्वाभाविक जिज्ञासा केँ शान्त करबाक लेल सीता ऋषि लोकनिक आज्ञा पाबि उत्तर देलनि-
हम अपन विवाह सँ पहिने जखन अपन पिताक घर मे छलहुँ, ओहि समय एकटा ब्राह्मण जनकपुर मे अतिथि बनि चातुर्मास्य (चारि मास) बिताबय लेल आयल छल। हमर पिताजी द्वारा हुनकर सेवा करबाक हमरे आज्ञा देल गेल। ओ अतिथि ब्राह्मण कतेको पवित्र स्थान पर गेल छलाह तेँ बीच-बीच मे कतेको विचित्र कथा कहैत छलाह । ओहि अतिथि ब्राह्मणक मुँहसँ हजारमुख रावणक विचित्र कथा सुनने छलहुँ । आइ अहाँ सभक समक्ष ओएह कथा प्रस्तुत करैत छी :
विश्रवा ऋषि के पत्नी के नाम कैकशी छल । कैकशीक दूटा पुत्र भेलनि। ओ जेठ पुत्रक नाम सहस्रमुख रावण आ छोटका पुत्रक दशमुख रावण रखलनि। दशमुख रावण त्रिभुवन पर विजय प्राप्त कए लंका मे बसि गेलाह । सहस्रमुख रावण पुष्कर द्वीप पर अपन नाना सुमाली के घर में रहैत छलाह। दशमुख रावण तऽ ब्रह्माक वरदान सँ त्रिलोक पर अधिकार प्राप्त केने छलाह । परन्तु सहस्रमुख रावण स्वाभाविकरूपेँ जन्मे सँ एतेक बलवान छल जे सूर्य आ चन्द्रमाकेँ गेंद बुझि ओकरा संग खेलाइत छल । इन्द्र सहित सब देवता हुनक अधीन भऽ गेलाह। लोक पर अत्याचार करब ओ अपन कर्तव्य बुझैत छल।
ओ सहस्रमुख रावण जखन समस्त लोक केँ भयभीत करय लागल, तखन हुनक पितामह पुलस्त्य आ पिता विश्रवा हुनका स्नेहपूर्ण शब्द सँ रोकलनि।
हमरा एहन आ अन्य विचित्र कथा सुनलाक बाद अतिथि ब्राह्मण जनकपुर नगर मे चारि मास बिता कए राजा केँ आशीर्वाद दऽ कए पुनः जनकपुर सँ तीर्थ यात्रा लेल विदा भऽ गेलाह ।
पुनः सीता बजलीह जे निस्संदेह हमर पति श्रीराम सुग्रीव आ हनुमानक सहयोग सँ दसमुख रावण केँ मारि समुद्र मे सेतु बनेनाइ सन असाधारण आ परोपकारी काज कएलाह । ओ सहस्रमुख रावण एखनो एहि संसार मे जीवित अछि । ओकर वधक बादे संसार मे पूर्ण सुख आ शांति भऽ सकैत अछि । तैं सहस्रमुख रावणक बध कएलाक बादे राम सही मायने मे अभिनन्दनक पात्र भऽ सकएत छथि।
तत्पश्चात श्रीराम सीताक संग पुष्पक विमान मे चढ़ि सहस्रमुख रावण केँ सेहो मारबाक लेल पुष्कर द्वीप दिस विदा भेलाह । ओतय उपस्थित सब ऋषि आ संत, भरत आदि सब भाय, सुग्रीवसहित सभ वानर प्रमुख, विभीषणसहित राक्षसक सेना, सुमन्त्र आदि सहित सभ मंत्री आ अयोध्याक मुख्य योद्धा ओहि पुष्पक विमान पर चढ़ि गेलाह ।
मनक गति सँ चलय वाला ओ पुष्पक विमान सँ जल्दिये पुष्कर द्वीप पर सब गोटे पहुँचि गेलाह। श्रीरामचन्द्रक नेतृत्व मे सब योद्धा ओतय गेलाह आ सिंहक गर्जन सँ ओहि सहस्रमुख रावण केँ युद्ध हेतु ललकारलन्हि । राक्षस सभ सेहो भयंकर गर्जन के संग अपन सैनिक सभक संग नगर सँ बाहर आबि श्रीराम के पास पहुंचल। दुनू सेना के बीच युद्ध शुरू भ गेल । एहि लड़ाई मे दुनू दिसक बहुतो लड़ाकू मारल गेल। एहि युद्ध मे एक दोसराक विरुद्ध अनेक दिव्य शस्त्रक प्रयोग भेल ।
शनैः-शनैः युद्ध मे मरलाक कारणेँ जखन राक्षसक सेना बहुत कम भऽ गेल, तखन स्वयं सहस्रमुख रावण युद्ध मे लड़बाक लेल तैयार भ गेलाह। ओतय रामक सेना केँ कमजोर बुझि हुनका लागल जे हुनका सभक संग युद्ध करब हुनका लेल उचित नहि अछि, तेँ ओ वायवास्त्रक प्रयोग करैत श्रीरामचन्द्रजीक अधिकांश सैनिक केँ अपन-अपन नगर मे पठा देलक।
वायवास्त्रक कोनो प्रभाव सीता, राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, विभीषण आदि राक्षस पर नहि पड़ल, कियैक तऽ ओ सभ पुष्पक विमाने पर बैसल छलाह। ओतय उपस्थित ऋषि लोकनि सेहो रामक सेनाक अवस्था देखि विस्मित भऽ गेलाह जखन भगवान् विष्णु स्वयं गरुड़ पर सवार भय ओहि रावण सँ लड़य लेल गेलाह तखन ओहो हुनका समुद्र मे फेकि देलक । एहन स्थिति देखि श्रीराम सेहो चकित भऽ गेलाह। अन्त मे राम आ सहस्रमुख रावणक बीच युद्ध शुरू भेल । बहुत दिन धरि दुनूक बीच विभिन्न दिव्य शस्त्र सँ युद्ध होइत रहल । अंततः राम सेहो बेहोश भऽ सहस्रमुख रावणक प्रहार सँ पुष्पक विमाने पर पर खसि पड़लाह ।
राम केँ एहन दयनीय अवस्था मे देखि ओतय उपस्थित ऋषि लोकनि भय सँ अभिभूत भय आतंकित भऽ कऽ हा-हाकार करऽ लगलाह, किछु गोटे शान्तिक मंत्र तक जपय लगलाह मुदा ओहि समय मे ऋषि लोकनि देखलनि जे सीता एखनो ओहिना मुस्कुराइत छथि। सीता केँ वसिष्ठ आ आन ऋषि-मुनिलोकनि कहलखिन, “हे सीता, अहाँ राम सँ एहेन भयंकर सहस्रमुख रावणक चर्चा कियै केलहुँ, जाहि सँ एहन भयावह घटना भेल ।”
तखन सीता क्रोध सँ आँखि मुनि अपन सीताक रूप छोड़ि सहस्रमुख रावण केँ युद्ध मे बजबैत मुण्डमाला आ हाथ मे तलवार लऽ कऽ महाविकट कालीक रूप धारण कऽ लेलनि । तत्पश्चात् बहुत कम समय में सीता कालीक रूप मे अन्य दुष्टात्मा सङ् ओहि सहस्रमुख रावण के सेहो मुड़ि काटि ओकरा सभकेँ मारि देलखिन। एहि बीच करोड़ो योगिनी सेहो हुनका संग युद्ध के मैदान में खेलय लेल आबि गेलीह । करोड़ो योगिनीक संग खेलाइत काली रूप मे सीताक भार सँ पृथ्वी पाताल दिस जाए लागल। भयक कारण भगवान् सूर्य के रथक घोड़ो सभ लगाम तोड़ि एम्हर-ओम्हर भागए लागल। पूरा दुनिया प्रलय के स्थिति मे आबि गेल। दुनियाँ मे सब ठाम भय सँ चीत्कार हुअ लागल।
तखन देवता लोकनिक प्रार्थना कयला पर सभ तरह के भार केँ सहन करयवला शिव शवक रूप धारण कए सीताक चरण जतय राखल गेल छल ओतय निश्चल सुति गेलाह जाहि सँ सीताक सम्पूर्ण भार शिव पर पड़ि गेल । तेँ पृथ्वी पर सीताक पैरक भार बिना धरती स्थिर भऽ गेल मुदा सीताक कदमक घोर ध्वनि, ओकर चिचियाहटि आ ओकर साँसक हवा सँ हिलैत ऊपरलोक एखनो अस्थिर छल । ई स्थिति देखि ब्रह्मा सहित सभ देवता विनम्र भऽ हुनकर स्तुति करय लगलाह, ई सोचि जे सीताक ई आवेग शान्त भऽ सकैत अछि । हुनक स्तुति केलाक बाद ब्रह्मा आ अन्य देवता लोकनि कहलनि – अहाँ सहस्रमुख रावण केँ मारि तीनू लोक मे सुख स्थापित केलहुँ, तइयो अहाँ योगिनी संग अपन नृत्य कला सँ लोकक नाश करबाक लेल तत्पर किएक देखाइत छी ? एहि जिज्ञासा केँ शान्त करबाक लेल ओ कहलनि जे हमर पति कमलनेत्र श्री रामचन्द्र हृदय मे तीक्ष्ण बाणक प्रहार सँ पुष्पक विमान मे मृत पड़ल छथि । राम के एहन अवस्था मे देखि संसारक कल्याण लेल हम की कऽ सकैत छी। जँ हमर पति श्रीरामचन्द्र जीक ई अवस्था बनल रहत तऽ हम एके ग्रासमे सम्पूर्ण संसार केँ खा जायब। देवी सीताक ई बात सुनि सब देवता हा-हाकार करए लगलाह आ धरती डोलय लगलाह। तकर बाद देवता सभक संग ब्रह्मा राम केँ हाथ सँ छूबि चेतना मे आनि देलखिन। चेतना मे अएलाक बाद राम उठि क हाथ मे बाण आ धनुष लऽ कऽ सहस्रमुख रावण के संबोधित कए कहलखि मे “अहाँ कतय छी हे दुष्ट रावण? आइ हम अहाँ केँ यम के नगरी पठा देब।” मुदा ओतय श्रीरामकेँ अपन आगू सामने ब्रह्मा आ अन्य देवता सब के देखल गेलाह मुदा अपन प्राण सँ बेसी प्रिय सीताकेँ नहि। अपितु देखलखिन जे युद्धक मैदान में एकटा काली सहस्रमुख रावणक पतित मुण्ड सँ नाचैत आ खेलाइत छैथ। ई सभ देखि भय सँ रामचन्द्र जीक हाथ सँ तीर-धनुष नीचा खसि पड़ल।
राम केँ एहि तरहें विस्मित देखि ब्रह्मा हुनका सँ समस्त कथा सुनौलन्हि। पुनः ब्रह्मा राम केँ कहलनि- राक्षस केँ मारि ई काली अपन काज पूरा कए अहाँ केँ मृतक जकाँ निश्चल पड़ल देखि अपन रोम सँ प्रकट कयल गेल अपन योगिनी सङ संसार केँ नष्ट करबाक लेल प्रलयकालीन नृत्य कऽ रहल छथि। ई काली कियो आन नहि अपितु अपनहिक प्राणप्रिया सर्वदोषरहिता आ सर्वगुणसम्पन्ना सीता छथि। एहि परब्रह्मस्वरूपा सीता केँ अपन स्वरूपमे स्तुति द्वारा अपनहि आनि सकएत अछि।
ब्रह्माक ई वचन सुनि श्रीराम सीतासहस्रनाम सँ कलजोड़ि कए कालीरूपा सीताक स्तुति कयलन्हि । स्तुतिक बाद काली रूपा सीता सँ प्रार्थना कएलन्हि जे – हे देवी, हमरा आब अहाँक एहि भयावह दिव्य रूप सँ डर होइत अछि । तेँ अहाँक जे अपन रूप अछि से हमरा देखाउ। राम के कहला के बाद योगिनी के साथ काली के रूपकेँ बदलि पुनः अपन असली लौकिक रूप (सीता के रूप) में आबि गेलीह।
एकर बाद राम सीताक संग पुष्पक विमान पर चढ़ि अयोध्या आबि गेलाह, जतय ओ अपन भाइ आ सीताक संग पृथ्वी पर निष्कणटक राज्य कएलन्हि आ देवता लोकनिक कल्याणक लेल सरयूक तट पर विभिन्न प्रकारक यज्ञ कएलन्हि, आ एगारह हजार वर्ष धरि शासन कएलन्हि।
एहि कथाक आधार पर ई प्रमाणित होएत अछि जे शवारूढा श्यामा आन कियो नहि अपि तु परब्रह्मस्वरूपा जगज्जननी जानकी सीता जी छैथ।
डॉ. सुरेश्वर झा
प्राचार्य (सेवानिवृत्त), स्नातकोत्तर-व्याकरणविभाग
का. सिं. द. संस्कृत-विश्वविद्यालय, कामेश्वरनगर, दरभंगा
(बिहार)

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