तुम दीपक मैं बाती प्रियवर
तुम दीपक मैं बाती प्रियवर,
संग-संग आज प्रज्वलित होंगे।
जीवन के दिव्य अनुष्ठान में,
स्नेह के पुष्प भी विकसित होंगे।
हवन कुंड सी पावन अग्नि,
प्रेम हृदय में अनवरत पलेगा।
साक्षी बन ये सप्तपदी,
अमरत्व का संदेश कहेगा।
तिमिर हटेगा, प्रकाश जगेगा,
खुशियों के क्षण निश्चित होंगे।
अंधियारा न समीप आएगा,
जब हम दोनों समर्पित होंगे।
ज्योति तुम्हारी, प्रकाश मेरा,
मिलन हमारा पुण्य परिणाम।
एकत्व की यह अखंड धारा,
पावन संबंध का अभिराम।
हर डगर पर हम साथ चलेंगे,
हर मुश्किल से निकसित होंगे।
प्रेम की डोर बँधी जो संग-संग,
स्वप्न-महल भी निर्मित होंगे।
घोर विपदा हो या अंधकार,
संकल्प हमारा न डिगने पाएगा।
हर क्षण समर्पण की गाथा,
बंधन अविनाशी कहलाएगा।।
अविरल बहेगी प्रेम की धारा,
हम मिलकर अखंडित होंगे।
यह बंधन है जन्म-जन्म का,
प्राणों में हम अंतरित होंगे।।
@स्वरचित व मौलिक
शालिनी राय ‘डिम्पल’
आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।