पुस्तक समीक्षा
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक का नाम: उड़ती पतंग
लेखक: दीपक गोस्वामी चिराग, शिव बाबा सदन, कृष्ण कुंज, बहजोई (संभल) 244410 उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9548 8 12618 तथा 8958 528 718
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड
X:30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेज 2, नई दिल्ली 1100 20
फोन 011 – 407 12200 संस्करण 2025
समीक्षक : रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451
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“उड़ती पतंग” पुस्तक में दीपक गोस्वामी चिराग ने इस बात पर चर्चा की है कि स्वतंत्रता और अनुशासन में सामंजस्य बिठाकर किस प्रकार विद्यार्थियों का हित साधना जाए। विभिन्न परस्पर विरोधी विचारों की अलग-अलग अध्यायों में चर्चा की गई है। जहॉं एक ओर लेखक को संगीत का पहला स्वर स्वतंत्रता नजर आता है, वहीं संगीत का दूसरा स्वर कठोर अनुशासन भी दिखाई देता है। प्रारंभिक प्रष्ठों पर ही लेखक ने स्वतंत्रता का अर्थ ‘जियो और जीने दो’ निर्धारित किया है। स्वतंत्रता के पक्ष में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर और गोस्वामी तुलसीदास के विचारों को लेखक ने उद्धृत किया है। स्वतंत्रता पर अनुशासन का नियंत्रण किस प्रकार किया जाए, असली चुनौती यही है। इसके लिए विविध विचारों का वर्गीकरण करते हुए अलग-अलग कोष्ठकों में उनकी समीक्षा लेखक ने की है।
लेखक ने एक विचार यूरोप की अठारहवीं शताब्दी की एक सूक्ति को उद्धृत करके दिया है, जो कहती है_ डंडा छोड़ा बच्चा बिगड़ा। यह दमनात्मक अनुशासन सिद्धांत लेखक ने बताया है। साथ ही यह भी कहा है कि यह सिद्धांत स्वतंत्र चिंतन क्षमता को नष्ट कर देता है।
अनुशासन का दूसरा सिद्धांत यह है कि कक्षा में शिक्षक अपने चरित्र से विद्यार्थी को अनुशासन में रहना सिखाएं। इसके लिए लेखक ने फ्रोबेल को उद्धार किया है। कहा है कि प्रेम और सहानुभूति से यह होना चाहिए।
एक सिद्धांत में लेखक ने बच्चों को प्राकृतिक रूप से उनमें यह भावना पैदा करने पर बल दिया है कि वह अपराध नहीं दोहराएंगे। इसमें प्रकृति को ही बालकों का शिक्षक मान लिया जाता है। लेकिन यह सिद्धांत भी पूरी तरह आलोचना से मुक्त नहीं है।
सामाजिक अनुशासन सिद्धांत पर भी पुस्तक में चर्चा है। इसका उद्देश्य बच्चों को अच्छा सामाजिक वातावरण देना है। प्रयोगात्मक रूप से उनमें अनुशासन और नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है। लेखक ने इस दृष्टि से अणुव्रत विहार, दिल्ली में शिक्षा संस्थानों का उदाहरण दिया है। यहां स्टोर खुले रहते हैं। उनमें वस्तुएं होती हैं। सबका मूल्य सूची में लिखा होता है। कोई विक्रेता या निरीक्षक नहीं होता। बच्चे चीज खरीदते हैं और उसकी कीमत पेटी में डाल देते हैं। यह आत्मानुशासन है। आचार्य तुलसी को उद्धृत करते हुए लेखक ने कहा है कि हर शिष्य में आत्म-अनुशासन स्वत: जागना चाहिए।
पुस्तक में उन परिस्थितियों पर भी चर्चा की गई है, जिससे बच्चे अनुशासनहीन बनते हैं। छात्र संघों और शिक्षक संघों की राजनीति को लेखक ने जहां इसके लिए एक कारण माना है, वहीं दूसरी ओर अनैतिकता के प्रसार में घर का कलह-पूर्ण वातावरण, मोबाइल फोन आदि का बढ़ता प्रयोग भी जिम्मेदार माना है। बड़ी महत्वपूर्ण बात लेखक ने यह भी लिखी है कि विद्यालयों में बच्चों को गृह कार्य दिया जाता है; लेकिन माता-पिता गरीब और निर्धन होते हैं, ऐसे में बच्चे अनुशासनहीन हो जाते हैं।
पुस्तक के अंतिम प्रष्ठों में लेखक ने इस बात पर बल दिया है कि संपूर्ण कक्षा के सामने किसी छात्र की अत्यधिक आलोचना नहीं करनी चाहिए। जटिल मुद्दों पर उनके अभिभावकों से सलाह करना चाहिए। जीवन में अनुशासन लाने के लिए जो सुझाव दिए गए हैं, उन पर अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा विचार करने से एक अच्छे समाज तथा अच्छे नागरिकों के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। पुस्तक उपयोगी है। प्रत्येक अभिभावक और शिक्षक को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए।