"बेटी की विदाई "
“बेटी की विदाई”
आया है समय विदाई का।
घर से बेटी को देने विदाई का। ।
उठ रही डोली बेटी की घर से।
जा रही दूर बहन भाई से। ।
जो बेटी थी आंखों का तारा,
आंगन के गलियारे का भौरा।
चली छोड़ अपने माँ बाप को,
रखकर नैनों में आंसु को।
होता देख अपनी बेटी को,
दूर अपनी आँखों से।
झलक रहे हैं बहुतक आंसु,
माँ बाप की आंखों से।।
मिल रही बेटी माँ – बाप से,
भाई अपनी बहन से।
जा रही है छोड़के सभी को,
रखकर नैनों में आंसु को।।
बाबुल के जिस आंगन में,
खेलती थी बचपन में।
बाबुल के उस आंगन को,
चली छोड़ परदेस को।।
शिवम विश्वकर्मा