दोहा सप्तक. . . . साँस
दोहा सप्तक. . . . साँस
पिंजर में हरदम करें, नटखट साँसें रास ।
रह जाता बेजान जब, साँसें छोड़ें वास ।।
देह दास है साँस की, इस बिन देह निष्काम ।
यह है तो है जिंदगी, वरना पूर्ण विराम ।।
एक साँस है जिंदगी, एक साँस अवसान ।
साँसें देती हैं सदा, जीवन को पहचान ।।
हो जाते गमगीन सब, देख देह को मौन ।
सभी सोचते प्राण को, ले जाता है कौन ।।
साँसों का रुकने लगा, जैसे जरा प्रवाह ।
रिश्तों में बढ़ने लगी, फिर मिलने की चाह ।।
रिश्ते जब गिनने लगे, तन की अन्तिम श्वास ।
इस तन की खंडित हुई, फिर जीने की आस ।।
दो मुख का संसार यह, चले दुरंगी चाल ।
साँसों तक पूछे नहीं, पीछे पूछे हाल । ।
सुशील सरना / 21-11-25