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21 Nov 2025 · 1 min read

जिंदगी

जिंदगी
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बहुत तन्हा -तन्हा रही जिंदगी,
जैसी भी हो गुजरती रही जिंदगी ।

कभी गिरी तो कभी उठी जिंदगी,
बड़ा मजा आया तुझमें ए जिंदगी ।

वक्त ने ठुकराई हौसलों ने चलाई जिंदगी,
कैसे-कैसे कतरा -कतरा हुई जिंदगी ।

चोट पर चोट खाती रही जिंदगी,
किंतु क्षण-क्षण निखरती रही जिंदगी ।

किस-किस से कहें शितम ढा गई जिंदगी,
मेरा सर्वस्व मुझसे छीन ले गई जिंदगी ।

नूर चेहरे पर सजाती रही जिंदगी,
मेरी अनमोल काया खाती रही जिंदगी ।

हमेशा झूठे-सच्चे ख्वाब दिखाती रही जिंदगी,
जैसी भी थी गुलशन मेरा महकती रही जिंदगी ।

सहकर पीर जुदाई की जीती रही जिंदगी,
गम के साये में भी मुस्कुराती रही जिंदगी ।

जब तक समझ में तू आई जिंदगी,
मुट्ठी से रेत की तरह निकल गई जिंदगी ।

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाक घर तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश 283111
9627912535

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