जिंदगी
जिंदगी
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बहुत तन्हा -तन्हा रही जिंदगी,
जैसी भी हो गुजरती रही जिंदगी ।
कभी गिरी तो कभी उठी जिंदगी,
बड़ा मजा आया तुझमें ए जिंदगी ।
वक्त ने ठुकराई हौसलों ने चलाई जिंदगी,
कैसे-कैसे कतरा -कतरा हुई जिंदगी ।
चोट पर चोट खाती रही जिंदगी,
किंतु क्षण-क्षण निखरती रही जिंदगी ।
किस-किस से कहें शितम ढा गई जिंदगी,
मेरा सर्वस्व मुझसे छीन ले गई जिंदगी ।
नूर चेहरे पर सजाती रही जिंदगी,
मेरी अनमोल काया खाती रही जिंदगी ।
हमेशा झूठे-सच्चे ख्वाब दिखाती रही जिंदगी,
जैसी भी थी गुलशन मेरा महकती रही जिंदगी ।
सहकर पीर जुदाई की जीती रही जिंदगी,
गम के साये में भी मुस्कुराती रही जिंदगी ।
जब तक समझ में तू आई जिंदगी,
मुट्ठी से रेत की तरह निकल गई जिंदगी ।
– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाक घर तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश 283111
9627912535