Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
21 Nov 2025 · 1 min read

विषय : देते हैं उपदेश

विषय : देते हैं उपदेश
(छंद प्रदीप)

कर्म स्वयं का बिना सुधारे,
देता जो उपदेश है।
शब्द जाल कितने हीं बुन लें,
असर न होता लेश है।।

कपटी छलिया ढोंगी कितने,
बढ़ा लिया जो केश है।
जन-जन को भरमाया करते,
धर कर साधू वेश है।।

विश्व शांति उद्घोषक भारत,
धर्म प्राण यह देश है।
मजहब के उन्माद भरे कुछ,
मचा रहा अब क्लेश है।।

ज्ञान वहीं जो कर्म सुधारे,
इसमें मीन न मेष है।
कर्म वचन में मेल नहीं तो,
समझो नकली भेष है।।

सबसे बढ़कर धर्म हमारा,
उचित नहीं आवेश है।
सर्वधर्म समभाव यहाँ पर,
करना हमको पेश है।।

__ अशोक झा ‘दुलार’

Loading...