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21 Nov 2025 · 3 min read

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा
पुस्तक का नाम: संस्कृत गद्यकाव्यों में लोकधर्म (सुबंधु दंडी और बाण के संदर्भ में)
लेखिका: डॉक्टर प्रीति अग्रवाल
निकट हनुमान मूर्ति, बजरंग विहार, रामपुर, उत्तर प्रदेश 244901
मोबाइल नंबर 8859608611
प्रकाशक: विद्या प्रकाशन, वार्ड नंबर 9, बाजपुर, उधम सिंह नगर उत्तराखंड 262401 फोन 75000 42420 तथा 9760 411975
प्रथम संस्करण: 2025
मूल्य: ₹595
समीक्षक: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451
_________________________
“संस्कृत गद्य काव्यों में लोकधर्म” डॉक्टर प्रीति अग्रवाल का शोध प्रबंध है।

शोध प्रबंध का पुस्तक के रूप में प्रकाशन बहुत जरूरी काम होता है। शोध प्रबंध की उपादेयता तभी है, जब वह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो। अब तक व्यवस्था यही चल रही है कि शोध प्रबंध की गिनी-चुनी प्रतियॉं टाइप की जाती हैं और संदूक में रखी रह जाती है। सार्वजनिक रूप से उसका लाभ नहीं होता। कुछ उत्साहित शोधकर्ता व्यक्तिगत प्रयासों से शोध-प्रबंध के प्रकाशन का कार्य हाथ में लेते हैं और उसे सबके लिए उपलब्ध करा देते हैं। डॉक्टर प्रीति अग्रवाल का यह पुस्तक प्रकाशन का कार्य ऐसा ही लोकहित का कार्य है। उनको साधुवाद।

शोध प्रबंध संस्कृत का है लेकिन पुस्तक में वह हिंदी भाषा में दिया गया है। उद्धरण संस्कृत के हैं लेकिन उनका भी अधिकांश भाग हिंदी अनुवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विषय की प्रमाणिकता को ध्यान में रखते हुए संदर्भ में ग्रंथ की पृष्ठ संख्या तथा मूल संस्कृत की कुछ पंक्तियां प्रत्येक अध्याय के अंत में दी गई हैं । इससे हिंदी पाठकों की रुचि शोध प्रबंध में बढ़ जाएगी।

प्रस्तुत पुस्तक में संस्कृत साहित्यकार सुबंधु, दंडी और बाण की रचनाओं में लोकधर्म के प्रसंग खोज कर सामने लाने का कठिन कार्य लेखक ने किया है। हर्षचरित, कादंबरी दशकुमार चरित्र संस्कृत के महान ग्रंथ हैं। लोकधर्म के संदर्भ में उनकी विस्तृत समीक्षा पुस्तक में की गई है। लोकधर्म का तात्पर्य सर्वसाधारण से है तथा राजाओं और राजकुमारों के बारे में मूल रूप से लिखते समय भी जो वर्णन आमजन का संस्कृत ग्रंथों में मिल रहा है उसका अपना महत्व है तथा लेखक ने उसे रेखांकित किया है।

पुस्तक को पढ़ने पर पता चलता है कि प्राचीन काल में भी राजाओं के यहां विवाह आदि में कार्य करने वाले तो मजदूर ही होते थे। हर्षचरित में ऐसे ही मजदूरों का चित्रण विद्वान लेखिका ने प्रस्तुत किया है और बताया है कि यह ” मजदूर हाथ में पोतने की कूॅंची उठाए, कंधों से चूने की हंडी लटकाए पुताई कर रहे हैं। मजदूर लोग पलस्तर कर रहे हैं.. सिंदूरी रंग के फर्श को मॉंजकर चमका रहे हैं।” (प्रष्ठ 202)

एक स्थान पर ग्रामीण क्षेत्र का चित्रण यह इस प्रकार से मिलता है कि ” उन्होंने जंगली पशुओं से रक्षा के लिए मचान बना रखे थे। मकान घास-फूस के बने हुए हैं। गांव के प्रवेश द्वारों पर प्याऊ है, जहां बैठकर लोग सत्तू खा रहे हैं।” (प्रष्ठ 162)

पुस्तक में एक स्थान पर मुर्गों के युद्ध का भी वर्णन है। लेखिका ने टिप्पणी की है कि ” ऐसा प्रतीत होता है कि पहले सामान्य जन अपने मनोरंजन के लिए पशु-पक्षियों को लड़ाते थे। उसे देखने के लिए बहुत से लोग एकत्रित होते थे। इसमें हार-जीत के बदले धन का भी प्रयोग किया जाता था।” (प्रष्ठ 132)

संक्षेप में शोध प्रबंध से प्राचीन भारत में आम जनता के क्रियाकलापों, रीति रिवाजों और रहन-सहन के तौर तरीकों पर प्रकाश पड़ता है। शोध प्रबंध उपयोगी भी है तथा लेखकीय-प्रवाह के कारण पठनीय भी बन पड़ा है।

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