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21 Nov 2025 · 1 min read

प्रणय शंख

///प्रणय शंख///

ग्राम्य पथिक के वक्र पथों से,
जो बारंबार चला करते हैं।
मन की अभिलाषा को लेकर,
नित्य निरंतर बहा करते हैं।।

मौन श्रृंखला की रज्जू बेल ये,
हरदम जुड़ती बढ़ती जाती है।
संतत पथ प्रशस्त हो जीवन में,
अविरल पवित्र प्रणय गाती है।।

चिर परिचित अभिलाषा लेकर,
मधु भ्रमर सा नीत कृष्ण तन्मय।
सुधाराग भरे प्रफुल्ल सुमन की,
रंजीत ऊषा बनी अरुण विनय।।

द्रुत गति से बढ़ते श्रृंगों पर,
द्रुत गति से चढ़ने का अभ्यास कहां।
क्या जाना उस अंतर तल को,
हरदम उठती रहती आस जहां।।

प्रफुल्ल दृगों का सत्य चिरंतन,
चढ़ता प्रेरित पथ के ऊपर।
उठ उठ कर मानव के रगों में,
लगता दौड़ने निर्मल रथ पर।।

राकेश चंद्र भी नैनों से करता,
स्निग्ध शीतलता की अभिलाषा।
अन्तर तल से उठती आशाएं,
चिर युग से हो ज्यों चातक प्यासा।।

जलधारा के विधुब्ध प्रवाह को,
शांत करने का प्रयास निरंतर।
जीवन के इन लघु आयासों से,
क्या देख सकेंगे अपना अन्तर।।

कितने ही उन रश्मि दंडों का,
आलोक नहीं यहां पहुंच पाया।
रोक लिया मेघों ने द्युति को,
अंधकार की क्यों हमको छाया।।

प्रेमी बनकर देव तरूणी का,
जो नव युवती की विरूदा है।
बज जावे जो शंख प्रणय का,
तो मधु जीवन का सजदा है।।

स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)

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