शीर्षक: निष्ठा और सत्ता के बीच फँसा कार्यकर्ता
शीर्षक: निष्ठा और सत्ता के बीच फँसा कार्यकर्ता
सुनील बनारसी
भारतीय राजनीति के विशाल कक्ष में दो पात्र सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं—नेता और कार्यकर्ता। दोनों एक ही यात्रा पर दिखते हैं, पर उनकी मंज़िलें, मानसिकताएँ और अपेक्षाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न होती हैं। सत्ता की राजनीति, और निष्ठा का संघर्ष—यहीं से वह विरोधाभास जन्म लेता है जो दशकों से भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को कुरेद रहा है। कार्यकर्ता वही है जो सुबह से शाम तक अपने नेता के लिए सड़कों पर दौड़ता है, झंडे उठाता है, नारे लगाता है, और ज़रूरत पड़े तो मरने–मारने पर भी आमादा हो जाता है। उसे लगता है कि उसका यह समर्पण, यह त्याग उसे एक दिन पहचान और अवसर दिलाएगा।
लेकिन राजनीति का मंच अक्सर उतना सरल नहीं होता, जितना वह समझता है। नेता की मानसिकता सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ने की होती है—और सीढ़ियों की खासियत होती है कि उन्हें कदमों के नीचे ही रखा जाता है। कार्यकर्ता को लगता है कि वह किसी आदर्श पुरुष का साथ दे रहा है, पर नेता की दृष्टि में वह अक्सर एक उपयोगी संख्या भर होता है। भीड़ की गर्मी चुनाव जितवा सकती है, पर भीड़ में खड़ा व्यक्ति नेता की याददाश्त में कभी जगह नहीं पाता। जितनी जरूरत होती है, उतनी अहमियत दी जाती है—यह राजनीति की पुरानी परंपरा है।
आज भी किसी भी बड़े शहर के चौराहे पर चुनावी रैलियों की हलचल थम जाने के बाद जब शाम को सफाईकर्मी अपनी लाठीदार झाड़ू के सहारे सड़कों की धूल समेट रहा होता है, तो उसके पास राजनीति का बड़ा सूक्ष्म लेकिन सटीक अनुभव होता है। वह बताता है कि किस पार्टी की टोली सबसे पहले आई थी, किसकी भीड़ सबसे शोरगुल वाली थी, किसके कार्यकर्ता अपने नेता के नाम पर उन्माद में बदल गए थे, और कौन सिर्फ भीड़ की संख्या बढ़ाने के लिए खड़े किए गए लोग थे—जिन्हें न नेता पहचानता था और न संगठन। सफाईकर्मी के लिए यह सब ‘राजनीति का कचरा’ है, पर यही कचरा असल में उस भीड़ की पहचान है जिसकी संख्या पर नेता अगले दिन मंच से दावा करता है।
लेकिन यही दृश्य तब निर्मम हो जाता है जब उसी भीड़ में से कोई कार्यकर्ता अगले दिन किसी झड़प में घायल होकर अस्पताल पहुँच जाता है, या किसी राजनीतिक टकराव में उसका नाम मुकदमे में दर्ज हो जाता है। जिस मंच पर खड़े होकर नेता ने उसकी निष्ठा को सराहा था, उसी मंच की रोशनी उसके संकट के समय उसे छूने तक नहीं आती। वह कार्यकर्ता, जिसने कभी नेता के लिए रातभर पोस्टर लगाए, घर-घर जाकर पर्चे बाँटे, और बिना थके उसके पक्ष में शोर मचाया—अब अकेला खड़ा मिलता है, जैसे उसकी भूमिका उसी दिन खत्म हो गई जब सभा का शोर खत्म हुआ।
वह उसी जगह लौट आता है जहाँ से वह चला था—
संघर्ष, उम्मीद और निराशा की त्रिकोण रेखा पर।
संघर्ष इसलिए कि उसे लगता है कि उसकी मेहनत किसी दिन दिखाई देगी;
उम्मीद इसलिए कि वह सोचता है कि शायद अगली बार उसे सम्मान मिलेगा;
और निराशा इसलिए कि हर बार वही बात दोहराई जाती है—भीड़ में उसका अस्तित्व सिर्फ एक चेहरे की नहीं, बल्कि एक संख्या की तरह गिना गया।
इस त्रिकोण में फँसा कार्यकर्ता किसी किताब का पात्र नहीं, बल्कि हमारी राजनीति का सबसे जीवित चरित्र है। मंच की रोशनी पर नेता का नाम चमकता है, पर अंधेरे में बैठा वही कार्यकर्ता सच जानता है—कि उसकी आवाज़ सिर्फ शोर का हिस्सा है, और उसका संघर्ष सिर्फ चुनावी आँकड़ों की एक अदृश्य रेखा। यही वह कड़वी विडंबना है जो राजनीति के बाहरी शोर में नहीं दिखती, पर सच्चाई सबसे गहरे अँधेरे में वहीं खड़ी रहती है—सफाईकर्मी की नजर में, और कार्यकर्ता की थकी हुई आँखों में।
व्यंग्य इतना सूक्ष्म है कि बोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
उदाहरण के लिए—चुनाव जीतने के बाद जो नेता कार्यकर्ताओं की पीठ थपथपाते थे, वही अगले दिन एसी दफ्तरों में रणनीतियाँ बनाते दिखते हैं। और वे कार्यकर्ता, जो उनके लिए रात भर जागते थे, अगली चुनावी तैयारी तक फिर उसी अंधेरे में छोड़ दिए जाते हैं।
यह किसी एक दल की कहानी नहीं—यह भारतीय राजनीति का “सार्वभौमिक सत्य” है।
फिर भी, इस पूरे परिदृश्य में सकारात्मकता की एक किरण है—कार्यकर्ता अब पहले जैसी भोली भीड़ नहीं रहा। वह समझने लगा है कि राजनीति सिर्फ नारे से नहीं चलती, विचार से चलती है; सिर्फ उत्साह से नहीं, संगठनात्मक योग्यता से चलती है। वह महसूस कर रहा है कि उसके भीतर का उन्माद ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है, और उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।
अगर उसे संभाल ले, तो वही उन्माद नेतृत्व बन सकता है; अगर उसे दूसरों के हाथ सौंप दे, तो वही उन्माद उसका शोषण बन जाता है।
नेता और कार्यकर्ता के बीच यह संबंध हमेशा जटिल रहेगा। नेता को सत्ता चाहिए, कार्यकर्ता को सम्मान। नेता उपयोग ढूँढता है, कार्यकर्ता अपनापन। नेता परिणाम देखता है, कार्यकर्ता कारण।
जब ये दोनों समझ में टकराते हैं, तब कार्यकर्ता थक कर बैठ जाता है—लेकिन यही उसकी जागृति का क्षण होता है।
निष्ठा अच्छी है, पर अंधी निष्ठा खतरनाक है; संघर्ष महान है, पर दिशा बिना संघर्ष व्यर्थ है— राजनीति का यह अदृश्य दर्शन किसी सूक्ति की तरह छोटा भले हो, पर इसके भीतर कार्यकर्ता के पूरे जीवन का सत्य छिपा हुआ है। राजनीति में निष्ठा वह आधार है जिस पर संगठन खड़ा होता है और कार्यकर्ता नेता को अपना आदर्श मानकर उसके सपनों को आगे बढ़ाता है। लेकिन यही निष्ठा जब विवेक खो देती है, जब वह सवाल पूछने की शक्ति को चुप करा देती है, तब वह निष्ठा नहीं, सिर्फ उपयोग का साधन बन जाती है। अंधी निष्ठा व्यक्ति को नेतृत्व का चेहरा देखने देती है, पर उसके पीछे छिपे स्वार्थ और रणनीति को नहीं दिखने देती। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने भी बिना सोच के किसी व्यक्तित्व का अनुसरण किया, वे अंत में उपेक्षित हुए, क्योंकि नेता को निष्ठा चाहिए होती है, पर कार्यकर्ता को सुरक्षा, सम्मान और विकास चाहिए—जो अंधी निष्ठा में गुम हो जाता है।
उधर संघर्ष भी अपने आप में महान है, क्योंकि वही व्यक्ति को साहस देता है, पहचान देता है और लक्ष्य तक ले जाने की शक्ति पैदा करता है। पर संघर्ष तभी सार्थक होता है जब उसकी कोई दिशा हो। नेता के पास हमेशा दिशा होती है—उसे पता होता है कि भीड़ कहाँ चाहिए, कब चाहिए और किसलिए चाहिए। पर कार्यकर्ता का संघर्ष कभी-कभी सिर्फ उत्साह और आवेश बनकर रह जाता है, जहाँ उसे यह पता ही नहीं होता कि वह किस मंज़िल की ओर भाग रहा है। दिशा के बिना किया गया संघर्ष सिर्फ शोर है—थकान है—और अंत में दूसरे के लिए लाभ, पर स्वयं के लिए हानि बन जाता है। नेता परिणाम देखता है, पर कार्यकर्ता सिर्फ प्रयास करता रहता है; और जब दोनों की दिशाएँ अलग हो जाती हैं, तब वही कार्यकर्ता, जो कभी उत्साह से भरा हुआ था, थक कर बैठ जाता है और सोचता है—“क्या मेरा संघर्ष मेरा था भी, या मैं सिर्फ किसी और की सीढ़ी बन गया?”
इन दोनों वाक्यों का संयुक्त अर्थ यही है कि राजनीति में निष्ठा और संघर्ष दोनों आवश्यक हैं, पर तभी जब वे विवेक और लक्ष्य के साथ जुड़े हों। विवेकयुक्त निष्ठा कार्यकर्ता को उपयोग होने से बचाती है, और लक्ष्ययुक्त संघर्ष उसे निरर्थक परिश्रम से। राजनीति कठिन है, पर कार्यकर्ता का भविष्य कठिन नहीं होना चाहिए। वह तभी सुरक्षित होगा जब वह नेता का अनुयायी मात्र न बने, बल्कि अपनी दिशा का स्वयं नियंता बने। यही वह दर्शन है जो कार्यकर्ता को भीड़ से अलग पहचान देता है—और राजनीति को सिर्फ सत्ता की दौड़ नहीं, बल्कि चेतना और विकास का मार्ग बनाता है।
और अंततः एक बात बहुत गहराई से उभरती है—राजनीति में कार्यकर्ता तभी फँसता है जब वह किसी दूसरे के सपने में इस कदर खो जाता है कि अपने सपनों की परछाई भी भूल जाता है। वह नेता के विज़न को अपना विज़न मान लेता है, नेता की महत्वाकांक्षा को अपना भविष्य, और नेता की सफलता को अपनी उपलब्धि। इसी भ्रम में वह अपनी संभावनाओं की जमीन छोड़ देता है और किसी और की बनाई हुई सीढ़ी पर चढ़ने की कोशिश करता है—जहाँ हर पायदान सिर्फ उसके उपयोग के लिए बना होता है, उसके विकास के लिए नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ कार्यकर्ता का सफर संघर्ष से शुरू होकर, निष्ठा में डूबता हुआ अंततः उपेक्षा में बदल जाता है।
लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
जिस दिन कार्यकर्ता यह समझ लेता है कि उसका भी एक सपना है—एक पहचान, एक दिशा, एक उद्देश्य—और वह दूसरे की इच्छाओं का किरायेदार बनने के बजाय अपने भविष्य का मालिक बनने लगेगा, उसी दिन राजनीति का चरित्र भी बदलने लगेगा। क्योंकि राजनीति तब तक नेता-केंद्रित रहती है, जब तक कार्यकर्ता अपनी ऊर्जा किसी और के लिए खर्च करता है; और उसी क्षण राजनीति लोक-केंद्रित, संगठन-केंद्रित और विचार-केंद्रित बनती है, जब कार्यकर्ता अपने विवेक के साथ खड़ा होता है।
जब कार्यकर्ता अपने सपनों का रास्ता खुद तय करने लगता है, तब वह सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं रहता, बल्कि निर्णयों का हिस्सा बनता है। वह किसी के लिए ताली बजाने वाला नहीं, बल्कि विचार रखने वाला बनता है। वह किसी नेता का अंध समर्थक नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सजग प्रहरी बनता है। और सबसे महत्वपूर्ण—वह किसी के लिए साधन नहीं, अपने लिए उद्देश्य बन जाता है।
यही वह परिवर्तन है जो राजनीति को स्वस्थ करता है, और कार्यकर्ता के भविष्य को सुरक्षित।
यही वह बोध है जो निष्ठा को विवेक से जोड़ता है, और संघर्ष को लक्ष्य से।
और यही वह समापन-सत्य है जो हर कार्यकर्ता को समझना चाहिए—
राजनीति का भविष्य नेताओं से नहीं,
अपने सपनों को पहचानने वाले कार्यकर्ताओं से बनता है।
सुनील बनारसी