मेरी फुलवा
मेरी फुलवा ! देखा किसीने नहीं उसके मन के झरोखे,
नितांत एकांकी पथ भी अनजाना,
बोझिल कदमों से नापती गांव पगडंडियां
सुखांत एकांकी पथ भी नहीं मनचाहा
चोटिल हृदय के तारों को छेड़ती कुलवंती फुलवा
शिथिल हो जातीअक्सर
एकांत बैठी लाजवंती फुलवा
अशांत हृदय ,दुखांत मन के झरोखे से झांकती धूमिल कल्पान्त किंवदंतियां,
वनान्त शामिल थी कभी कोकिल, रसवंती बोलियां ,
निशांत बैठी रणचंडीआक्रांत गुम हुई किलकारियां
सिद्धांत लुप्त हुए आज ,दृष्टांत भी अवर्णनीय,
संभ्रांत समाज शर्मशार हो !क्यों ये कारगुजारियां?
मन के झरोखे झांक लो
दिखेंगे होते दिग्भ्रांत युवावर्ग
डाल दे उसमें कोई संस्कारियां
पंअंजू पांडेय अश्रु खरोरा