गणपति
212 212 212 212
पाश है हाथ में, भाल त्रिशूल है।
विघ्न के नाश को पास में चूल है।
साथ में दूब है थाल मोदक भरा।
बाल हैं काल हैं शिशु न कह भूल है।।
रिद्धि दो सिद्धि दो हे प्रभो हे प्रभो।
बुद्धि का दान दो हे प्रभो हे प्रभो।
शरण में हम पड़े प्रभु कृपा कीजिए।
विघ्न को काट दो हे प्रभो हे प्रभो।।
कष्ट हर ताप हर काज पूरा करो।
शंभु के सुत सुनो कोष मेरा भरो।
पूर्ण हो कामना वंदना मैं करूँ ।
माँ उमा लाल हे ,ध्यान हम पे धरो।।
-गोदाम्बरी नेगी